04 May 2008

हाइकु-2009 हेतु रचनाएँ आमंत्रित


’हाइकु-1989‘ व ’हाइकु-1999‘ नामक चर्चित संकलनों के बाद हाइकु की हिन्दी में प्रथम चर्चा के स्वर्ण जयन्ती वर्ष 2009 में प्रकाशन हेतु प्रस्तावित हाइकु-2009 में सम्मिलित किए जाने हेतु विचारार्थ देश-विदेश के हिन्दी हाइकुकारों से हाइकु रचनाएँ सादर आमन्त्रित हैं। संकलन हेतु निम्न-शर्तें लागू होंगी -


१. हाइकु-1989 व हाइकु-1999 में शामिल रचनाकार इसमें शामिल नहीं होंगे।


२. संकलन में शामिल होने का एक मात्र आधार रचना की गुणवत्ता होगा।


३. प्रत्येक रचनाकार अपने कम से कम 25 प्रतिनिधि हाइकु परिचय व चित्र सहित भेजें।


४. स्वीकृति अथवा अस्वीकृति की सूचना के लिए पता लिखा पोस्टकार्ड या टिकिट लगा लिफाफा भी अवश्य संलग्न करें।


५. यह एक अव्यावसायिक एवं निजी अनुष्ठान है अतः यदि कोई रचनाकार या व्यक्ति इसमें सहयोग करना चाहे तो न्यूनतम 1000 रु0 (एक हजार रुपए) धनादेश द्वारा भेज सकता है। (इस सहयोग को रचना सम्मिलित करने की शर्त न समझा जाए)


६. रचना भेजने की अन्तिम तिथि 30 जून 2008 होगी।


ईमेल से हाइकु भेजने के लिए पता-
jagdishvyom@gmail.com


डाक से भेजने के लिए-
कमलेश भट्ट कमल
सम्पादक
हाइकु-2009
के.एल.-154, कविनगर, गाजियाबाद (उ.प्र.)
मोबा. 09968296694

12 April 2008

हिन्दी का प्रथम कवि

राहुल सांकृत्यायन की हिन्दी काव्यधारा के अनुसार हिन्दी के सबसे पहले मुसलमान कवि अमीर खुसरो नहीं, बल्कि अब्दुर्हमान हुए हैं। ये मुलतान के निवासी और जाति के जुलाहे थे। इनका समय १०१० ई० है। इनकी कविताएँ अपभ्रंश में हैं।
-(संस्कृत के चार अध्याय, रामधारी सिंह दिनकर, पृष्ठ ४३१ )

11 April 2008

नवगीत सुने

फोंट परिवर्तक

23 March 2008

शहीद दिवस पर

भगत सिंह प्रायः यह शेर गुनगुनाते रहते थे-

जबसे सुना है मरने का नाम जिन्दगी है
सर से कफन लपेटे कातिल को ढूँढ़ते हैं।।


मार्च १९३१ को सायंकाल ७ बजकर २३ मिनट पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु फाँसी के फंदे पर झूल गए। श्रीकृष्ण सरल द्वारा लिखी गई कविता उनके ग्रंथ क्रान्ति गंगा से साभार यहाँ दी जा रही है।



आज लग रहा कैसा जी को कैसी आज घुटन है
दिल बैठा सा जाता है, हर साँस आज उन्मन है
बुझे बुझे मन पर ये कैसी बोझिलता भारी है
क्या वीरों की आज कूच करने की तैयारी है ?

हाँ सचमुच ही तैयारी यह, आज कूच की बेला
माँ के तीन लाल जाएँगे, बगत न एक अकेला
मातृभूमि पर अर्पित होंगे, तीन फूल ये पावन,
यह उनका त्योहार सुहावन, यह दिन उन्हें सुहावन।

फाँसी की कोठरी बनी अब इन्हें रंगशाला है
झूम झूम सहगान हो रहा, मन क्या मतवाला है।
भगत गा रहा आज चले हम पहन वसंती चोला
जिसे पहन कर वीर शिवा ने माँ का बंधन खोला।

झन झन झन बज रहीं बेड़ियाँ, ताल दे रहीं स्वर में
झूम रहे सुखदेव राजगुरु भी हैं आज लहर में ।
नाच नाच उठते ऊपर दोनों हाथ उठाकर,
स्वर में ताल मिलाते, पैरों की बेड़ी खनकाकर।

पुनः वही आलाप, रंगें हम आज वसंती चोला
जिसे पहन राणा प्रताप वीरों की वाणी बोला।
वही वसंती चोला हम भी आज खुशी से पहने,
लपटें बन जातीं जिसके हित भारत की माँ बहनें।

उसी रंग में अपने मन को रँग रँग कर हम झूमें,
हम परवाने बलिदानों की अमर शिखाएँ चूमें।
हमें वसंती चोला माँ तू स्वयं आज पहना दे,
तू अपने हाथों से हमको रण के लिए सजा दे।

सचमुच ही आ गया निमंत्रण लो इनको यह रण का,
बलिदानों का पुण्य पर्व यह बन त्योहार मरण का।
जल के तीन पात्र सम्मुख रख, यम का प्रतिनिधि बोला,
स्नान करो, पावन कर लो तुम तीनो अपना चोला।

झूम उठे यह सुनकर तीनो ही अल्हण मर्दाने,
लगे गूँजने और तौव्र हो, उनके मस्त तराने।
लगी लहरने कारागृह में इंक्लाव की धारा,
जिसने भी स्वर सुना वही प्रतिउत्तर में हुंकारा ।

खूब उछाला एक दूसरे पर तीनों ने पानी,
होली का हुड़दंग बन गई उनकी मस्त जवानी।
गले लगाया एक दूसरे को बाँहों में कस कर,
भावों के सब बाँढ़ तोड़ कर भेंटे वीर परस्पर।

मृत्यु मंच की ओर बढ़ चले अब तीनो अलबेले,
प्रश्न जटिल था कौन मृत्यु से सबसे पहले खेले।
बोल उठे सुखदेव, शहादत पहले मेरा हक है,
वय में में ही बड़ा सभी से, नहीं तनिक भी शक है।

तर्क राजगुरु का था, सबसे छोटा हूँ मैं भाई,
छोटों की अभिलषा पहले पूरी होती आई।
एक और भी कारण, यदि पहले फाँसी पाऊँगा,
बिना बिलम्ब किएऌ मैं सीधा स्वर्ग धाम जाऊँगा।

बढ़िया फ्लैट वहाँ आरक्षित कर तैयार मिलूँगा,
आप लोग जब पहुँचेंगे, सैल्यूट वहाँ मारूँगा।
पहले ही मैं ख्याति आप लोगों की फैलाऊँगा,
स्वर्गवासियों से परिचय मैं बढ, चढ़ करवाऊँगा।

तर्क बहुत बढ़िया था उसका, बढ़िया उसकी मस्ती,
अधिकारी थे चकित देक कर बलिदानी की हस्ती।
भगत सिंह के नौकर का था अभिनय खूब निभाया,
स्वर्ग पहुँच कर उसी काम को उसका मन ललचाया।

भगत सिंह ने समझाया यह न्याय नीति कहती है,
जब दो झगड़ें, बात तीसरे की तब बन रहती है।
जो मध्यस्त, बात उसकी ही दोनों पक्ष निभाते,
इसीलिए पहले मैं झूलूं, न्याय नीति के नाते।

यह घोटाला देख चकित थे, न्याय नीति अधिकारी,
होड़ा होड़ी और मौत की, ये कैसे अवतारी।
मौत सिद्ध बन गई, झगड़ते हैं ये जिसको पाने,
कहीं किसी ने देखे हैं क्या इन जैसे दीवाने ?


मौत, नाम सुनते ही जिसका, लोग काँप जाते हैं,
उसको पाने झगड़ रहे ये, कैसे मदमाते हें।
भय इनसे भयभीत, अरे यह कैसी अल्हण मस्ती,
वन्दनीय है सचमुच ही इन दीवानो की हस्ती।

मिला शासनादेश, बताओ अन्तिम अभिलाषाएँ,
उत्तर मिला, मुक्ति कुछ क्षण को हम बंधन से पाएँ।
मुक्ति मिली हथकड़ियों से अब प्रलय वीर हुंकारे,
फूट पड़े उनके कंठों से इन्क्लाब के नारे ।

इन्क्लाब हो अमर हमारा, इन्क्लाब की जय हो,
इस साम्राज्यवाद का भारत की धरती से क्षय हो।
हँसती गाती आजादी का नया सवेरा आए,
विजय केतु अपनी धरती पर अपना ही लहराए।


और इस तरह नारों के स्वर में वे तीनों डूबे,
बने प्रेरणा जग को, उनके बलिदानी मंसूबे।
भारत माँ के तीन सुकोमल फूल हए न्योछावर,
हँसते हँसते झूल गए थे फाँसी के फंदों पर।

हुए मातृवेदी पर अर्पित तीन सूरमा हँस कर,
विदा हो गए तीन वीर, दे यश की अमर धरोहर।
अमर धरोहर यह, हम अपने प्राणों से दुलराएँ,
सिंच रक्त से हम आजादी का उपवन महकाएँ।

जलती रहे सभी के उर में यह बलिदान कहानी,
तेज धार पर रहे सदा अपने पौरुष का पानी।
जिस धरती बेटे हम, सब काम उसी के आएँ,
जीवन देकर हम धरती पर, जन मंगल बरसाएँ।।
= श्रीकृष्ण सरल

शहीद दिवस

आज शहीद दिवस है। आज के दिन शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने हँसते-हँसते भारत की आजादी के लिए 23 मार्च 1931 को 7:23 बजे सायंकाल फाँसी का फंदा चूमा था।
भगत सिंह पर यहाँ पढिए-
http://bhagatsinghmahakavya.blogspot.com

06 February 2008

वचनेश जी की कुछ हास्य रचनाएँ

कवि वचनेश जी हास्य के बहुत चर्चित कवि हैं। प्रस्तुत हैं वचनेश जी के कुछ हास्य छन्द-


पौडर लगाये अंग गालों पर पिंक किये
कठिन परखना है गोरी हैं कि काली हैं।
क्रीम को चुपर चमकाये चेहरे हैं चारु,
कौन जान पाये अधबैसी हैं कि बाली हैं।
बातों में सप्रेम धन्यवाद किन्तु अन्तर का,
क्या पता है शील से भरी हैं या कि खाली हैं।
'वचनेश` इनको बनाना घरवाली यार,
सोच समझ के ये टेढ़ी माँग वाली हैं।
-(परिहास, पृ०-१०) वचनेश


घर सास के आगे लजीली बहू रहे घूँघट काढ़े जो आठौ घड़ी।
लघु बालकों आगे न खोलती आनन वाणी रहे मुख में ही पड़ी।
गति और कहें क्या स्वकन्त के तीर गहे गहे जाती हैं लाज गड़ी।
पर नैन नचाके वही कुँजड़े से बिसाहती केला बजार खडी।।
-(परिहास, पृ०-३०)वचनेश



उपजेगी द्विजाति में रावण से मदनान्ध अघी नर-नारि-रखा।
रिपु होंगे सभी निज भाइयों के धन धान्यहिं छीने के आप-चखा।
यदि पास तलाक हुई तो सुनो हमने 'वचनेश` भविष्य लखा।
फिर होंगी नहीं यहाँ सीता सती मड़रायेंगी देश में सूपनखा।।
-(परिहास, पृ०-२८)वचनेश

12 January 2008

गोरी मधु बोरी सी

आँकी सी बाँकी सी झाँकी सी स्यार की
गोरी मधु बोरी सी, नर्मदा कछार की
शी फूल शीश पर अमुवा के बौर सा
चुनरी का गोटा है दुलहन के मौर सा
चाँदी की झालरियाँ पंख ज्यों मयूर के
कानों के झुमके ज्यों गुच्छे अंगूर के
माथे का स्वेद ज्यों चिरौंजियाँ अचार की ।।

बड़ी बड़ी गोल आँख तरबूजा चीर सी
आँखों की आभा भी रेवा के नीर सी
गालों की लाली भी दाल ज्यों मसूर की
अरहर अषर देह गंष ज्यों कपूर सी
हँसने में खिल खिलती कली जयों अनार की ।।

भरी भरी छाती जयों भरे कनक कलशे हों
आँचल से ढँके भरे दूध या कि जल से हों
पतली सी पुष्ट कमर ककड़ी की देह रे
माखन और गोरस सा अन्तर का स्नेह रे
गोल गोल बाँहें ज्यों शाखें कचनार की ।।

कटि का करधौना ज्यों गढ़ का परकोटा रे
घेरदार लँहगे का भार कर कछौटा रे
पिंडली में लिपट रहे तोड़ों के गीत रे
पैंजन भी बन बैठे एड़ी के मीत रे
बिछुओं की झुनझुन ज्यों रागिनी सितार की ।।

मचल मचल चलती ज्यों सतपुड़िया निर्झरी
बहक बहक चलती ज्यों गंध पवन बावरी
ठिठक ठिठक चलती भिनुसार की तरैया सी
सिहर सिहर चलती अगहन की पुरवैया सी
छलक छलक चलती ज्यों बादरिया क्वाँर की ।।

-बृजमोहन सिंह ठाकुर

20 October 2007

सूरज का टुकड़ा

वक्त के मछुआरे ने
फेंका था जाल
कैद करने के लिए
सघन तम को
जाल के छिद्रों से
फिसल गया तम
और कैद हो गया
सूरज का टुकड़ा ।
वक्त का मछुआरा
कैद किए फिर रहा है
सूरज के उस टुकड़े को
और
सघनतम होती जा रही है
तमराशि घट घट में
उगानी होगी
सूरज के नए टुकड़ों की नई पौध
जगानी होगी बोधगम्यता
युग शिक्षक के अन्तस में
तभी खिलेगी वनराशि
महकेगा वातास
छिटकेंगीं ज्ञान रश्मियाँ ।
क्यों न चल पडें हम
अभी से ! हाँ अभी से !!
इस नए पथ की ओर
कहा भी गया है
जब आँख खुलें
तभी होती है भोर
तभी होती है भोर !!

-डा० जगदीश व्योम

25 June 2007

रामेश्वर दुबे की कविता









रामेश्वर दुबे
सी–57
परिवहन अपार्टमेंट
सेक्टर 5, वसुन्धरा–201012
गाजियाबाद
फोन– 0120– 2884318


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युद्ध

युद्ध हमेशा से था, है, रहेगा
युद्ध की विभीषिका थी, है, रहेगी
राजा का युद्ध राजा के लिए प्रजा
हमेशा लड़ती थी, लड़ती है, लड़ती रहेगी
चाहे हो युद्धिष्ठिर, दुर्योधन, कृष्ण, शकुन का राजतंत्र
चाहे हो बुश, ब्लेयर, बाजपेयी का प्रजातंत्र
राजा का लालच
राजा की महत्वाकांक्षा
राजा का घमंड
राजा का फरेब
राजा का झूठ
राजा का षड्यन्त्र
ये सब चीजें–
हमेशा से थीं, हैं, रहेंगी
रोग, भ्रष्टाचार, भुखमरी, गरीबी
पहले से ही बढ़ी थी, बढ़ती है, बढ़ती रहेगी
क्योंकि लड़ाई हमेशा से होती थी,
होती है, होती रहेगी
पर एक लड़ाई और थी
जनता की अपनी
जिसे जनता लड़ती रही है
आगे भी लड़ेगी
सभी शासकों, राजाओं एवं
युद्धों के खिलाफ
जिसमें
जनता जीतेगी
या
पूरी दुनिया मरेगी !

—रामेश्वर दुबे

18 June 2007

सुरेश श्रीवास्तव"सौरभ" की दो कविताएँ



सुरेश श्रीवास्तव "सौरभ"


जन्म- 13 मार्च 1968
शिक्षा- एम. ए. हिन्दी साहित्य
सम्प्रति- अभिकर्ता भारतीय जीवन बीमा निगम
पत्र पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन तथा आकावाणी और दूरदर्शन से रचनाओं का प्रसारण़ ।
मंचों पर काव्य पाठ।




सम्पर्क सूत्र—


सिविल लाइन
नई कालोनी, पन्ना (म.प्र.)488001
मोबा.9425166562

***************



हवा



जहरीली हवा
बहने लगी
आदमी बौने हो गए
पेड़ मचलना
बिसर गए
फूल की उदासी देख
तितली हैरान है
उधर
नागफनी जवान है !
—सुरेश श्रीवास्तव "सौरभ"




छन्द


विश्व बंधुत्व का करो तो आज शंखनाद
नाश करो हर भेद–भाव के विसाद को
राम का ये देश है औ संस्कार राम के हैं
आगे ब़ढ़ गले से लगाइए निषाद को
जाति धर्म वर्ग में समाज खण्ड खण्ड हुआ
पोस रहे रोज नए वाद को विवाद को
भारती की भावना का गान रखने के लिए
जड़ से मिटाइये जहाँ से उग्रवाद को !
-सुरेश श्रीवास्तव "सौरभ"

09 June 2007

अभिनन्दन समारोह


04 May 2007

लड़की









शिवसिंह पतंग आधुनिक हिन्दी कविता के वरिष्ठ कवि हैं। "चाँदनी के अंधकार में" तथा "अपनी आस पर केवल" आपके प्रकाशित काव्य संग्रह है तथा "एक थी अतरी" और "धागी खम्मा अन्नदाता" आपके उपन्यास हैं ।

यहाँ प्रस्तुत हैं उनकी बहुचर्चित कविता -
"लड़की"


लड़की के सिर पर है हरी घास का भारा
लड़की हरी घास का भारा नहीं है
अपनी जरूरतों के लिए हरे घास का भारा
बिकने आता है बाजार में
लड़की बाजार में नहीं आती
खरीददार आता है अपने जानवर के वास्ते
पूछता है— पन्द्रह–सोलह पूले तो होंगे
तो चलो, सुनकर चल पड़ता है
हरे घास का भारा
लड़की नहीं चलती
तब जानवर के सामने पूले–पूले
तिनकों तिनकों में बिखर जाता है
हरे घास का भारा
लड़की कहीं नहीं दिखती
होता नहीं मोल भाव
क्योंकि हरे घास का भारा
अब हरा नहीं है।
****
शिवसिंह पतंग
संपर्क-
किला कोतवाली
राजगढ़ ब्यावरा म०प्र०

Mob- 7372254742

26 April 2007

बी.एल.गौड़ की दो कविताएँ




बी.एल.गौड़
प्रधान सम्पादक
गौडसन्स टाइम्स (मासिक पत्र)

सम्पर्क- आर 8/23 राजनगर
गाजियाबाद

********

ऐ हिमखण्ड गलो मत ऐसे







ऐ हिमखण्ड गलो मत ऐसे
जैसे मेरी उमर गली
मैंने तो सब कुछ ही खोया,
तुमको फिर भी नदी मिली।

मुझ में तुममें अन्तर केवल
मैं भी कोमल तुम भी कोमल
मैं भी था बस तब तक भावुक
जब तक लगे न मन पर चाबुक
फिर, अपनों के दंश मिले
शत्रु बनकर मित्र मिले
तुम पाकर ताप लगे बहने
मैं पाकर दर्द लगा लिखने
मैं रोया तो क्या पाया?
तुम रोये तो राह मिली।
ऐ हिमखण्ड गलो मत ऐसे ..........।

आओ हम तुम मित्र बनें
कुछ पीड़ा मैं तुमको दूँ
कुछ सपने मैं तुमसे लूँ
फिर दोनों हमराज़ बनें
दु:ख, कहने से बँट जाता है
सुख, कहने से घट जाता है
कितना भी हो कठिन सफ़र
बातों में कट जाता है
बातों से हटकर देखोगे
पाओगे यह उमर ढली।
ऐ हिमखण्ड गलो मत ऐसे
जैसे मेरी उमर गली
मैंने तो सब कुछ ही खोया,
तुमको फिर भी नदी मिली।

-बी.एल.गौड़
****


*****

आकुल धुन







जाने कब से पनप रही है ख़ामोशी की आकुल धुन
पीड़ा साफ झलकती है यदि मन में लगा हुआ हो घुन ।

याद किसी की आती है तो मन की पीर सताती है
जब बिछुड़ा कोई मिलता क्यों आँख अश्रु बरसाती है
आँगन मेह बरसता है जब मौसम रंग बदलता है
दूर कहीं से आती है तब जंगल बीच समाई धुन ।
जाने कब से पनप रही है ख़ामोशी की आकुल धुन।।


नीलगगन में उड़ते बादल अद्भूत चित्र बनाते हैं
द्वार-ओट से झाँक रहे कजरारे नयन बुलाते हैं
दो शिखरों के बीच कहीं सूरज के रंग बिखरते हैं
परिचित सी आवाज़ बुलाती, ओ ! नाराज़ बटोही सुन।
जाने कब से पनप रही है ख़ामोशी की आकुल धुन।।


कभी-कभी कोई बेचैनी आकर मुझे बुलाती है
छुपकर बैठी याद किसी की चपला-सी चौंकाती है
लाख जतन करने पर भी जब रूठी नींद नहीं आती
तो आकर थपकी दे जाती किसी गीत की बिसुरी धुन।
जाने कब से पनप रही है ख़ामोशी की आकुल धुन।।
-बी.एल.गौड़****

15 April 2007

ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' की कविताएँ




ओमप्रकाश चतुर्वेदी पराग की कविताएँ -
कविता कोश पर देखें-
अन्यत्र





आत्म-नियंत्रण
तुम मुझसे तब मिली सुनयने
अर्थ मिलन के बदल गये जब !
मैं तब तुम्हें चुराने पहुँचा
सब रखवाले सँभल गये जब !!

करता था जब सूर्य चिरौरी, लेता चन्द्रमा बलाएँ
साँसों में चन्दन, कपूर था, अधरों पर मादक कविताएँ
तब तुम जाने कहाँ बसी थीं, जाने और कहाँ उलझी थीं
दुनिया झुम रही थी जिन पर, तुमने वे देखी न अदाएँ
आँगन ने तब मुझे पुकारा
पाँव द्वार से निकल गये जब !

अब जब बिखर गईं सौगातें, अब जब बहुत बढ़ गई दूरी
जीवन-वन में भटक %u09

11 April 2007

शिव सिंह पतंग की कविताएँ











शिव सिंह पतंग

कस्तूरी और हिरन

आग की बात उसने मुझे
पानी से लिक्खी
लिक्खा कि
पानी से अँधेरे पर दस्तक दो तो
सब कुछ
रोशन रोशन हो जाता है
पढ़ते हुए मैंने कहा था
जहाँ आधी नदी एक तरफ
आधी दूसरी तरफ सिमटी थी
जिसके किनारे घास थी
हिरन
हिरन की नाभि में थी
कस्तूरी
कस्तूरी और हिरन ....
ऐसा क्यों होता है कस्तूरी हिरन
कि कौंधती है बिजली बादल में
और
हरियाली के
दरवाजे दरवाजे
अंकुराने लगते हैं
आम्र मौर
मंजरियाँ !

-शिव सिंह पतंग

संपर्क-
किला कोतवाली
राजगढ़ ब्यावरा म०प्र०

02 March 2007

हाथों में पिचकारियाँ

बच्चों में किलकारियाँ
हाथों में पिचकारियाँ
हर मन को बहुत लुभाती है होली !

चेहरों पर रंगीलापन
हृदय में मिश्री सा मन
बिखरों को फिर से मिलाती है होली !

मिष्ठानों का सतरंगी रंग
गलियों में मस्ती की जंग
हवा सी खूबियाँ फैलाती है होली !

हर कोई गाता है फाग के गीत
कोयल सुनाती नया संगीत
बहारों का मौसम लाती है होली !

होली खुशियाँ बाँटने का त्योहार
लाया संग भगोरिया बाजार
दिलों में नया रंग भर जाती है होली !

-राजेश पंवार
कक्षा ११ विज्ञान
जवाहर नवोदय विद्यालय
देवास मध्य प्रदेश

28 December 2006

टाँट्या भील : अद्भुत नाट्य प्रस्तुति


सिनेमा और दूरदर्शन ने नाटकों की मंचीय प्रस्तुति को बहुत नुकसान पहुँचाया है, ऐसा माना जाता है। परन्तु नाटक का मंचन यदि मँजे हुए कलाकारों के द्वारा हो और कुशल निर्देशक हो तो आज भी नाटकों का खोया हुआ स्वर्णिम काल फिर वापस आने में समय बहीं लगेगा। स्वतंत्रता संग्राम में टांट्या भील का बहुत बड़ा योगदान रहा है। टांट्या ने गरीब जनता के अधिकार की लड़ाई शुरू की। उसने अंग्रेजों के विरुद्ध आदिवासी जनता को एक मंच पर लाकर क्रांति का शंखनाद किया। वह भीलों तथा जनमानस में आज भी देवता की तरह पूजा जाता है। स्वराज संस्थान संचालनालय, संस्कृति विभाग भोपाल तथा जिला प्रशासन होशंगाबाद एवं वन्या प्रकाशन, भोपाल की ओर से स्थानीय एस० एन० जी० स्कूल के हाल में टांट्या भील पर जनयोद्धा शीर्षक से नाटक का दिनांक २८‍ १२ २००६ को सायं ७ बजे से मंचन किया गया। इस नाटक का निर्देशन श्री संजय मेहता द्वारा किया गाया। नाटक में जिन कलाकारों ने भाग लिया उन्हें देखकर तो ऐसा लग रहा था मानो टांट्या साक्षात अपने आदिवासी भीलों सहित आ गया हो। संवाद, अभिनय, प्रकाश व्यवस्था सब कुछ ऐसी कि जंगल का वास्तविक दृश्य ही लग रहा था।
जिन लोगों ने वर्षों से नाटक नहीं देखा था वे भी इस नाटक को देखकर यह कहते हुए पाये गए कि यदि ऐसे नाटक हर शहर में होने लगें तो लोग सिनेमा छोड़कर फिर नाटकों की ओर आयेंगे।
इसी शृंखला में २७ दिसंबर को श्री माधव बारीक द्वारा निर्देशित नाटक अवंतीबाई भी बहुत प्रशंसनीय रहा। २९ दिसंबर को सुश्री प्रीति त्रिपाठी द्वारा निर्देशित नाटक अज़ीजन का मंचन किया जाएगा।
टांट्या भील की प्रस्तुति देखकर दर्शक बहुत प्रभावित हुए।
इस अवसर पर श्री संतोष व्यास के संचालन में शहीद चन्द्रशेखर आजाद युवा मण्डल होशंगाबाद के प्रदेश अध्यक्ष श्री श्रीकृष्ण यादव द्वारा सभी कलाकारों का माल्यार्पण कर अभिनन्दन किया गया।

25 December 2006

हाइकु दिवस समारोह

हाइकु दिवस समारोह 4 दिसम्बर 2006

हाइकु दिवस समारोह 4 दिसम्बर 2006 गाजियाबाद

हाइकु दिवस समारोह 4 दिसम्बर 2006 रायबरेली

दैनिक जागरण में रिपोर्ट

अनुभूति / अभिव्यक्ति पर समाचार

हाइकु दर्पण में

22 October 2006

हिन्दी चर्चा वाया यू.एस.ए.(भाग- 3)

दुष्यन्त समारोह से वापस आगरा लौटते हुए वहले ही यह तय हो चुका था कि रास्ते में हजरतपुर रुकना है। रामेश्वर काम्बोज हजरतपुर केन्द्रीय विद्यालय में प्राचार्य हैं और हिन्दी साहित्य की तमाम विधाओं से एक साथ जुड़े हुए हैं। लगभग हर पत्र-पत्रिका में उनकी रचनाएँ तो मिलेंगी ही वे इण्टरनेट पर भी खूब सक्रियता के साथ जुड़े हुए हैं। हम लोग बातें कर ही रहे थे कि ड्राइवर ने संकेत किया कि हजरतपुर आ गया है।
काम्बोज जी प्रतीक्षा कर रहे थे और साथ में थे हिन्दी मंच के ओजस्वी कवि सन्तोष पाण्डेय। सन्तोष पाण्डेय बहुत अच्छा लिखते हैं और कविताएँ बहुत ही अच्छी तरह प्रस्तुत भी करते हैं। विगत वर्षों में सन्तोष जी अपने दुपहिया वाहन से टकरा गए और उन्हें शारीरिक रूप से काफी परेशान होना पड़ा। लेकिन अब वे स्वस्थ हैं। काम्बोज जी और सन्तोष जी को आमने-सामने रहते देखकर काफी सन्तोष हुआ।
काम्बोज जी के यहाँ पहुँचते ही समोसे, मिठाई और चाय का दौर समाप्त हुआ तो कविता सुनने-सुनाने की सुगबुगाहट शुरू हो गई। सोम ठाकुर बैठे हों और उन्हें बिना कविता सुनाये छोड़ दिया जाये, यह भी भला कभी संभव है। सोम जी ने हर अवसर के लिए कविताएँ लिखी हैं जिनमें उनकी कुछ कविताएँ तो अति लोकप्रिय और कालजयी हैं। विशेष रूप से जिन कविताओं में लोकतत्व समाहित हो जाता है उन कविताओं का माधुर्य स्वत: ही बढ़ जाता है और फिर जब लोकगीत सोमठाकुर के कण्ठ से फूटे तो फिर बात ही क्या है।
भारतीय नारी अपने पति की उपस्थिति सर्वत्र पाती है। उसे पूरी सृष्टि में अपने पति की ही भीनी-भीनी गंध महसूस होती है, चाहे उसका श्रृंगार हो या घर-द्वार सब जगह उसके प्यारे पिया ही तो महक रहे हैं। इसी भाव-भूमि का लोकगीत सोमठाकुर ने सुनाया तो सारी थकान दूर हो गई और ऐसी सुगंध महकी कि मुझे तो अब भी महसूस हो रही है..... शायद आपको भी इस लेख में से महसूस हो सके तो जरूर बताइयेगा-
बेला न महके
चमेली न महके
मेरे गजरे में मेरे पिया महकें।
(पूरा गीत फिर कभी ........)
सभी की कविताओं का एक-एक दौर चला और फिर हम लोग आगरा के लिए चल दिए। सोम ठाकुर को उनके आवास पर छोड़कर कटारे जी, कमलेश जी के साथ अशोक रावत के आवास पर आ गए।
पूरे दिन कुछ न कुछ खाते ही रहे इस लिए भूख तो गायब ही थी पर रावत जी के घर का स्वादिष्ट भोजन आकर्षित कर रहा था इसलिए थोड़ा थोड़ा खा कर फिर कमलेश भट्ट कमल और अशोक रावत की नई गजलें सुनी। अशोक रावत का एक शेर तो अब तक मन पर छाया हुआ है-
थोड़ी मस्ती थोड़ा सा ईमान बचा पाया हूँ
इतना क्या कम है अपनी पहचान बचा पाया हूँ।। (अशोक रावत)
रात काफी हो गई थी..... हम लोग सो गये क्योंकि सुबह जल्दी उठकर गुड़गाँव के लिए प्रस्थान करना था।

................ (क्रमश: .......) .........

21 October 2006

दीवाली पर दो हाइकु और एक नवगीत


दीवाली पर दो हाइकु और एक नवगीत के साथ सभी को दीपावली की शुभकामनाएँ !!

घट जाएगा
तम का ये पसारा
दीप हुंकारा।
*****
सदा से बैर
अंधकार का सिर
दिए के पैर।
०००
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नवगीत

बाँध रोशनी की गठरी
फिर आई दीवाली।।

पूरी रात चले हम
लेकिन मंज़िल नहीं मिली
लौट-फेर आ गए वहीं
पगडंडी थी नकली
सफर गाँव का और
अंधेरे की चादर काली।
बाँध रोशनी की गठरी
फिर आई दीवाली।।

ताल ठोंक कर तम के दानव
कितने खड़े हुए
नन्हें दीप जुटाकर साहस
कब से अड़े हुए
हवा, समय का फेर समझकर
बजा रही ताली।
बाँध रोशनी की गठरी
फिर आई दीवाली।।

लक्ष्य हेतु जो चला कारवाँ
कितने भेद हुए
रामराज की बातें सुन-सुन
बाल सफेद हुए
ज्वार ज्योति का उठे
प्रतीक्षा दिग-दिगन्त वाली।
बाँध रोशनी की गठरी
फिर आई दीवाली।।

लड़ते-लड़ते दीप अगर
तम से, थक जाएगा
जुगुनू है तैयार, अँधेरे से
भिड़ जाएगा
विहँसा व्योम देख दीपक की
अद्भुत रखवाली।
बाँध रोशनी की गठरी
फिर आई दीवाली।।

-डॉ० जगदीश व्योम