30 August 2009

रेलकर्मी रचनाकारों की पुस्तकें

1. अंगारों के आगे-शिवकुमार गौतम, काव्य संग्रह (प्रकाशित), सार्थक प्रकाशन गौतम नगर, दिल्ली, सं0-1994 ई0.
2. अन्तिम साक्ष्य-डा0 स्नेह मोहनीश, उपन्यास (प्रकाशित), प्रभात प्रकाशन दिल्ली, सं0-1994 ई0.
3. अनुत्तरित-दिनेश पाठक ‘शशि कहानी संग्रह (प्रकाशित), कल्पतरु प्रकाशन, कर्णगली, शाहदरा दिल्ली-32, सं0-1995 ई0.
4. अनुपम बाल कहानियाँ-दिनेश पाठक ‘शशि बालकहानी संग्रह (प्रकाशित), श्रीशिव शक्ति प्रकाशन कोसी कलाँ, सं0-1996 ई0.
5. अपना मकान-विपिन विहारी, कहानी संग्रह, संजय प्रकाशन रायपुर डुमरा पटना-1995ई0.
6. अपने ही खिलाफ-रमेश नीलकमल, कविता संग्रह, संजय प्रकाशन रामपुर डुमरा, पटना, सं0-1995 ई0.
7. अमर ज्योति-दिनेश पाठक ‘शशि कहानी संग्रह (प्रकाशित), अभिरुचि प्रकाशन, गली-11, शाहदरा दिल्ली-32, सं0-1996 ई0.
8. आग और लाठी-रमेश नीलकमल, कविता संग्रह, संजय प्रकाशन रामपुर डुमरा, पटना, सं0-1985 ई0.
9. आत्मा का सौन्दर्य (कहानी संग्रह)-थम्मन सिंह सरस, साहित्य प्रचार सेवा, लखनऊ, सं0-1986 ई0.
10. आदमी को तलाशते हुए-डा0 प्रेमपाल शर्मा, काव्य संग्रह (प्रकाशित), जयश्री प्रकाशन दिल्ली, सं0-1989 ई0.
11. आधार शिला (उपन्यास)-थम्मन सिंह सरस, सन्मार्ग प्रकाशन दिल्ली-7, सं0-1997
12. आधार शिला-कृष्णमुरारी लाल मधुकर, कविता संग्रह (प्रकाशित), शशि प्रकाशन प्राचीन टिकैतगंज लखनऊ, सं0-1995 ई0.
13. आधुनिक रेलवे दूर संचार -(मोहन किसन कौल)-अभियान प्रकाशन-204-ए, मुनीरिका गाँव, नई दिल्ली.
14. आधे पर अंत-विपिन विहारी, कहानी संग्रह, अतिश प्रकाशन रोड दिल्ली.
15. आस्था के दीप-सन्तोष कुमार सिंह (हाइकु संग्रह), साहित्य संगम मथुरा, सं0- 2002 ई0.
16. और कन्हाईचरण ढोल मर गया-डा0 स्नेह मोहनीश, कहानी संग्रह (प्रकाशित), प्रभात प्रकाशन दिल्ली, सं0-1998 ई0.
17. इतिहास का पन्ना-धनेश्वर प्रसाद निरंजन, काव्य संग्रह, अयन प्रकाशन, नई दिल्ली, सं0 1995 ई0.
18. इतिहास झूठ बोलता है-सिद्धेश्वर, कविता संग्रह, अयन प्रकाशन दिल्ली, सं0 1993 ई0.
19. एक और महाभारत-रमेश नीलकमल, कहानी संग्रह, संजय प्रकाशन रामपुर डुमरा, पटना, सं0-1994 ई0.
20. एक मुट्ठी आसमान-सत्येन्द्र सिंह, काव्य संग्रह (प्रकाशित), सहयोग प्रकाशन, नई दिल्ली, सं0-1985 ई0
21. एक सवाल एवं अंकशायनी-सत्येन्दु याज्ञवल्क्य, उपन्यास, नीतिका प्रकाशन, दिल्ली, सं0-1998 ई0.


22. ए.सी.कर्षण नियमावली अनुरक्षण एवं परिचालन, जिल्द-1, मार्च-1994, प्रकाशक-रेलमंत्रालय, रेलभवन, रायसीना रोड नई दिल्ली-1.
23. ए.सी.कर्षण नियमावली अनुरक्षण एवं परिचालन, जिल्द-2, भाग-2 प्रकाशन वर्ष-1993, प्रकाशक-रेलमंत्रालय, रेलभवन, रायसीना रोड नई दिल्ली-1.

24. एक मसीहा की वापसी-डा0 स्नेह मोहनीश, कहानी संग्रह (प्रकाशित), जनप्रिय प्रकाशन शाहदरा दिल्ली, सं0-1985 ई0.
25. ऐसा नहीं हो सकता-सुरेन्द्र दीप, काव्य संग्रह, उद्गार प्रकाशन कलकत्ता, सं0 1997 ई0.
27. कई अदद उठे हाथ-लालसा लाल तरंग, कथा संग्रह, एकता प्रकाशन बरौनी, सं0-1978 ई0.
29. कल के लिए-डा0 स्नेह मोहनीश, उपन्यास (प्रकाशित), पूर्वोदय प्रकाशन शाहदरा दिल्ली, सं0-1980 ई0.
30. कहानी जंकशन-विपिन जैन,कहानी संकलन, सम्यक् प्रकाशन गाजियाबाद, सं0-2000
31. कहानी संग्रह-विपिन जैन, सचिन प्रकाशन दरियागंज दिल्ली-2, सं0-1994 ई0.
32. काले कोट का सफेद दिन-रामदेव सिंह, कहानी संग्रह, प्रकाशन संस्थान दरियागंज दिल्ली-2, सं0-1999
33. कार्य मूल्यांकन -(सुभाष गोडबोले)-सौ. सुमित्रा गोडबोले- वैशम्पायन 137, लोकमान्य नगर इन्दौर (म.प्र.)
34. किसने छेड़े तार-राजवीर खुराना ‘वरन गीत संग्रह, डबरा, ग्वालियर, संस्करण-2001
35. किट्टी-दिनेश पाठक ‘शशि बालउपन्यास (प्रकाशित), जाहन्वी प्रकाशन शाहदरा, दिल्ली-32, सं0-2002 ई0.
36. कैलाश कल्पित अभिनन्दन मंजूषा- संपादक-पं0 राजाराम शुक्ल, प्र0-पारिजात प्रकाशन, 341, बहादुर गंज, इलाहाबाद-3, संस्करण-1999.
37. कुछ गीत अनाम के नाम-के.के.सिंह मयंक, काव्य संग्रह (प्रकाशित), सप्तरंग साहित्य संस्था, रतलाम।
38. खरीदी कौड़ियों के मोल- लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद, प्र0 संस्करण-1979.
39. खोया हुआ बचपन-संजीव जायसवाल ‘संजय कहानी संग्रह, आत्माराम एण्ड संस, दिल्ली, सं0-2001 ई0.
40. गुम हवा कुछ करेगी-लालसा लाल तरंग, काव्य संग्रह, राधिका प्र0,भोलाघाट, एलवल, आजमगढ़, सं0-1999 ई0.
41. गीतों से हम सीखें ज्ञान (शिशु गीत)-गोपीचन्द श्रीनागर, मरिल पब्लिेकेशन, वाराणसी, सं0-1994 ई0.
42. गुलाब के काँटे (उपन्यास)-थम्मन सिंह सरस, सन्मार्ग प्रकाशन दिल्ली-7, संस्करण-1987 ई0.
43. घेरा-धनेश्वर प्रसाद निरंजन, कहानी संग्रह, संजय प्रकाशन रामपुर डूमरा, संस्करण- 1996 ई0.
44. चतुरंग-विमल मित्र-राजकमल एण्ड संस दिल्ली, सं0-1992.
45. चन्दन वन डूब गया-किशन सरोज, गीत संग्रह, सवेरा प्रकाशन, मुरादाबाद, संस्करण-1986.
46. चुनमुन बालगीत-गोपीचन्द श्रीनागर, श्यामशिव प्रकाशन झाँसी, सं0-1990 ई0.
47. चिर अकेला-दिनेश प्रताप सिंह, कहानी संग्रह, उपकार साहित्य सदन, 200ए/5 नयापुरा, स्टेनलीरोड, इलाहाबाद-2- संस्करण-1997ई0.
48. चैराहे का मोड़ (उपन्यास)-थम्मन सिंह सरस, आत्माराम एण्ड सन्स दिल्ली-6, सं0-1993 ई0.
49. चैराहे-डा0 प्रेमपाल शर्मा, उपन्यास, साहित्य सहकार प्रकाशन दिल्ली-2, संस्करण-1992
50. ज़ज्ब-ए-इश्क-के.के.सिंह मयंक, काव्य संग्रह (प्रकाशित), कीर्ति साहित्य प्रकाशन रतलाम।
51. जय केशव-सत्येन्दु याज्ञवल्क्य, संजीव प्रकाशन दिल्ली, सं0 प्रथम-2001.
52. जय झाँसी की रानी (शिशु गीत)-गोपीचन्द श्रीनागर, श्यामशिव प्रकाशन झाँसी, सं0-1994 ई0.
53. जवा कुसुम, कहानी संग्रह (प्रकाशित), प्रभात प्रकाशन दिल्ली, सं0-1996 ई0.
54. जादुई अँगूठी-दिनेश पाठक ‘शशि बालकहानी संग्रह (प्रकाशित), जाहन्वी प्रकाशन शाहदरा, दिल्ली-32, सं0-2001 ई0.
55. जी हाँ, हिन्दुस्थान है ये-हरिप्रसाद धर्मक विशाल, व्यंग्य कविता संग्रह, राजहंस प्रकाशन, अमरावती, सं0-1985 ई0.
56. टूटा समय-धनेश्वर प्रसाद निरंजन, काव्य संग्रह, कुमार प्रकाशन, गढ़हरा, मुंगेर, सं0 1972 ई0.
57. टूटी हुई जमीन (उपन्यास)-हरदर्शन सहगल, पाण्डुलिपि प्रकाशन दिल्ली-51, सं0-1996 ई0.
58. टेड़े मुँह वाला दिन (कहानी संग्रह)-हरदर्शन सहगल, अभिव्यंजना प्रकाशन दिल्ली-26, सं0-1982 ई0.
59. डम-डम डीगा-डीगा-संजीव जायसवाल ‘संजय’, बाल उपन्यास, विजय प्रकाशन दरियागंज, नई दिल्ली, सं0-2000 ई0.
60. डी.सी.विद्युत कर्षण समस्याएँ विचार व विकल्प -(व.वि.काथवटे-1989), विलेपार्ले बम्बई-56, वर्ष-1989.
61. तीर्थशिला,-दुर्गादत्त त्रिपाठी, दुर्गादत्त:एक परिचय, डा0 गिरीश चन्द्र त्रिपाठी, सं0-प्रथम-1972.
62. तीसरी चिट्ठी-डा0 प्रेमपाल शर्मा, कहानी संग्रह, सचिन प्रकाशन दरियागंज दिल्ली-2, सं0-1989 ई0.
63. दरख्त की व्यथा-हरिप्रसाद धर्मक विशाल, काव्य संग्रह, राजशेखर प्रकाशन, बड़ौरा, डेढ़गाँव, गाजीपुर, सं0-1987 ई0.
64. दादी की पहेलियाँ (बाल काव्य)-गोपीचन्द श्रीनागर, श्यामशिव प्रकाशन झाँसी, सं0-1991 ई0.
65. नन्हें बच्चे नन्हें गीत (शिशु गीत)-गोपीचन्द श्रीनागर, गौतम ब्रदर्स कानपुर, सं0-1997
66. नया घासीराम-रमेश नीलकमल, कहानी संग्रह, संजय प्रकाशन रामपुर डुमरा, पटना, सं0-1994 ई0.
67. नया बीन (नाटक)-थम्मन सिंह सरस, सन्मार्ग प्रकाशन दिल्ली-7, सं0-2001 ई0.
68. निर्बलता का शाप-दुर्गादत्त त्रिपाठी, (परिचय भाग), ऋषि कवि, सं0-1996.
69. प्रतीक्षा-अरुणकुमार जैन, कहानी संग्रह (प्रकाशित), श्रीशिव शक्ति प्रकाशन कोसी कलाँ, सं0-1997 ई0.
70. पलास के फूल (उपन्यास)-थम्मन सिंह सरस, आत्माराम एण्ड सन्स दिल्ली-6, सं0-1997 ई0.
71. पर्यावरण की कहानी-सन्तोष कुमार सिंह, दादा जी की जुवानी, बाल उपन्यास (प्रकाशित), कवि सभा, गाजियाबाद, सं0-2000 ई0.
72. पिज्जा और छेदीलाल-डा0 प्रेमपाल शर्मा, कहानी संग्रह (प्रकाशित), वाणी प्रकाशन दिल्ली, सं0-1997 ई0.
73. पुस्तकों की हड़ताल-दिनेश पाठक ‘शशि बालकहानी संग्रह (प्रकाशित), श्रीशिव शक्ति प्रकाशन कोसी कलाँ, सं0-1996 ई0.
74. पुनर्वास-विपिन विहारी, कहानी संग्रह, कामना प्रकाशन लोनी रोड दिल्ली-1999ई0.
75. पूजा-सत्येन्दु याज्ञवल्क्य, उपन्यास, दिव्या प्रकाशन, प्रज्ञा पीठ मथुरा, सं0-1990
76. पेड़ का दर्द-सन्तोष कुमार सिंह, बालगीत संग्रह (प्रकाशित), साहित्य संगम मथुरा, सं0-1994 ई0.
77. बदलते केनवस-सत्येन्दु याज्ञवल्क्य, उपन्यास, नीतिका प्रकाशन, दिल्ली, सं0-1998
78. ब्र्रजस्थ म्ैथिल कवि-लेखक-डा० राधेविहारी लाल सक्सेना, पृ0 96, प्रकाशन-1998 ई0 मथुरा.
79. बोल जमूरे-रमेश नीलकमल, कहानी नाटक, संजय प्रकाशन रामपुर डुमरा, पटना, सं0-1987 ई0.
80. बोलो मेरे मीत-हरिप्रसाद धर्मक विशाल, काव्य संग्रह (प्रकाशित), भारत प्रकाशन मंदिर अलीगढ़, सं0-1995 ई0.
81. बौर फागुन का-डा० स्नेह मोहनीश, कहानी संग्रह (प्रकाशित), पूर्वोदय प्रकाशन शाहदरा दिल्ली, सं0-1981 ई0.
82. भक्ति प्रसून-अरुणकुमार जैन, काव्य संग्रह, संस्करण-1998, दिवा कीर्ति शिक्षा एवं कल्याण समिति, ललितपुर (उ.प्र.).
83. भूल जाना तुझे आसान तो नहीं-सुदेश कुमार मेहर, शिव संकल्प परिषद, होशंगाबाद, जुलाई-2001.
84. भूमण्डलीकरण, निजीकरण व हिन्दी (डा० माणिक मृगेश), संस्करण-2000, प्रकाशक- वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-2.
85. मयंक की गजलें-के.के.सिंह मयंक, काव्य संग्रह (प्रकाशित), डायमण्ड पाकेट बुक्स दिल्ली।
86. मयंक के गीत एवं गीतिकाएँ-के.के.सिंह मयंक, काव्य संग्रह (प्रकाशित), मेहरा प्रकाशन, आगरा।
87. मर्यादित (कहानी संग्रह)-हरदर्शन सहगल, अनुराग प्रकाशन,महरौली दिल्ली-30, सं0-1990 ई0.
88. महामिलन (उपन्यास)-थम्मन सिंह सरस, सन्मार्ग प्रकाशन दिल्ली-7, सं0-1997
89. महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनका युग-लेखक- डा0 उदयभानु सिंह, प्रकाशक-लखनऊ विश्वविद्यालय लखनऊ, संस्करण- संवत्-2008 विक्रम.
90. मांझी मन होशियार-रमेश नीलकमल, गीत संग्रह, संजय प्रकाशन रामपुर डुमरा, पटना, सं0-1994 ई0.
91. मै समय हूँ-विपिन जैन, लघुकथा संग्रह, नीतिका प्रकाशन विश्वास नगर दिल्ली-32, सं0-1996 ई0.
92. मोहन काव्य सुधा (सं0 प्रेमदत्त मिश्र मैथिल) मैथिल प्रकाशन, 39 सूरसदन, कैलाश मंदिर नगरा, झाँसी, संस्करण-2000.
93. मौसम (कहानी संग्रह)-हरदर्शन सहगल, अभिव्यंजना प्रकाशन दिल्ली-26, सं0-1980
94. यशस्वी जीवन-दिनेश प्रताप सिंह, बालोपयोगी, उपकार साहित्य सदन इलाहाबाद-1999ई0.
95. यात्रा पथ-कृष्णमुरारी लाल मधुकर, कविता संग्रह (प्रकाशित), शशि प्रकाशन प्राचीन टिकैतगंज लखनऊ, सं0-1999 ई0.
96. यात्रा पथ-कृष्णमुरारी लाल मधुकर, कविता संग्रह (प्रकाशित), शशि प्रकाशन प्राचीन टिकैतगंज लखनऊ, सं0-1999 ई0.
97. रंग बिरंगी कहानियाँ-संजीव जायसवाल ‘संजय बालकहानी संग्रह, शारदा प्रकाशन दरियागंज, दिल्ली-2, सं0-2002 ई0.
98. रंगाये जोगी कपड़ा (उपन्यास)-थम्मन सिंह सरस, आत्माराम एण्ड सन्स दिल्ली-6, सं0-1997 ई0.
99. राजभाषा प्रशिक्षण एक परिचय- संपादक-बी.डी.पाण्डेय, संस्करण-1996, प्रकाशक- केन्द्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान, राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, 7वां तल, पर्यावरण भवन, लोदी रोड नई दिल्ली.
100. रानी अवन्तीवाई (नाटक)-थम्मन सिंह सरस, सन्मार्ग प्रकाशन दिल्ली-7, सं0-1990
101. रानी अवन्तीवाई लोधी (जीवनी)-थम्मन सिंह सरस, साहित्य केन्द्र प्रकाशन दिल्ली-51, सं0-1995 ई0.
102. रानी अवन्तीवाई (महाकाव्य)-थम्मन सिंह सरस, सन्मार्ग प्रकाशन दिल्ली-7, सं0-1987
103. राम की कथा (शिशु गीत)-गोपीचन्द श्रीनागर, श्यामशिव प्रकाशन झाँसी, सं0-1992
104. रुकती नहीं नदी-डा0 स्नेह मोहनीश, उपन्यास (प्रकाशित), जनप्रिय प्रकाशन शाहदरा दिल्ली, सं0-1985 ई0.
105. रुनझुन बालगीत-गोपीचन्द श्रीनागर, श्यामशिव प्रकाशन झाँसी, सं0-1995 ई0.
106. रेल परिवहन का स्वरूप -(महेन्द्र कुमार मिश्र)-सुशीला प्रकाशन, सी-1/1294, सेक्टर-सी, पाकेट-1, बसन्त कुंज, नई दिल्ली-37, संस्करण-1984.
107. रेल पथ ज्ञान-1 -(पी.सी.अग्रवाल)-कमला प्रकाशन, 100-ए, जेड-टी.एस.चन्दौसी.
108. रेल सुरक्षक सोपान -(जयचन्द्र झा), प्रकाशक-ग्राम पो0 रानी (वचवाड़ा) बेगूसराय
109. रेलगाड़ियाँ एक दृष्टि में-जुलाई-2002-जून-2003), भारतीय रेल भवन, नई दिल्ली-1
110. रेल अधिनियम-1989, श्री के.एल.मोहनपुरिया- प्रकाशक-प्रकाशन नियंत्रक भारत सरकार, सिविल लाइन्स, दिल्ली-54.
111. रेल स्थापना नियम पुस्तक -(सोहन लाल शर्मा)-प्रभात प्रकाशन, चावड़ी बाजार, नई दिल्ली.
112.रस मीमांसा- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल- नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, तृतीय संस्करण संवत्-2017.
113.रंग बिरंगी कहानियाँ-संजीव जायसवाल ‘संजय बालकहानी संग्रह, शारदा प्रकाशन दरियागंज, दिल्ली-2, सं0-2002 ई0.
114.रंगाये जोगी कपड़ा (उपन्यास)-थम्मन सिंह सरस, आत्माराम एण्ड सन्स दिल्ली-6, सं0-1997 ई0.
115.राजभाषा हिन्दी विषयक आदेशों का संकलन- तृतीय संस्करण-1993- प्रकाशक- भारत सरकार, रेलमंत्रालय, (रेलवे बोर्ड) रायसीना रोड, नई दिल्ली-1.
116. रानी अवन्तीवाई (नाटक)-थम्मन सिंह सरस, सन्मार्ग प्रकाशन दिल्ली-7, सं0-1990
117.रानी अवन्तीवाई लोधी (जीवनी)-थम्मन सिंह सरस, साहित्य केन्द्र प्रकाशन दिल्ली-51, सं0-1995 ई0.
118.रानी अवन्तीवाई (महाकाव्य)-थम्मन सिंह सरस, सन्मार्ग प्रकाशन दिल्ली-7, सं0-1987
119.राम की कथा (शिशु गीत)-गोपीचन्द श्रीनागर, श्यामशिव प्रकाशन झाँसी, सं0-1992
120.रुकती नहीं नदी-डा0 स्नेह मोहनीश, उपन्यास (प्रकाशित), जनप्रिय प्रकाशन शाहदरा दिल्ली, सं0-1985 ई0.
121.रुनझुन बालगीत-गोपीचन्द श्रीनागर, श्यामशिव प्रकाशन झाँसी, सं0-1995 ई0.
122.रेलवे दूर संचार गाइड (भाग-1), लेखक-विनोद कुमार गुुप्ता, प्रकाशक- बर्मन एण्ड कं0 24/6 गŸाा मिल कालोनी, सहारनपुर, प्रकाशन वर्ष-1989.
123. रेल परिवहन का स्वरूप -(महेन्द्र कुमार मिश्र)-सुशीला प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित-1984.
124.रेल पथ ज्ञान-1 -(पी.सी.अग्रवाल)-कमला प्रकाशन, 100-ए, जेड-टी.एस.चन्दौसी.
125. रेल सुरक्षक सोपान -(जयचन्द्र झा), प्रकाशक-ग्राम पो0 रानी (वचवाड़ा) बेगूसराय (विहार).
126. लोरी ठिठोली-अरुणकुमार जैन, बालकविता संग्रह (प्रकाशित) सं0 1999 ई0.
127. लाल चाय-धनेश्वर प्रसाद निरंजन, कहानी संग्रह, कुमार प्रकाशन, निरंजन निवास, मदारपुर दरभंगा, सं0 1997 ई0.
128. लाल बंगला-संजीव जायसवाल ‘संजय बाल उपन्यास, विजय प्रकाशन दरियागंज, नई दिल्ली, सं0-2000 ई0.
129. लेखनी चलती रहेगी-साकेत सुमन चतुर्वेदी, काव्य संग्रह (प्रकाशित), साहित्य निकेतन प्रकाशन सकरार झाँसी, सं0-1997 ई0.
131.वन्देमातरम्-के.के.सिंह मयंक, काव्य संग्रह (प्रकाशित), ऐवाने ख्वाब, आगरा, सं0-1998.
132. विरादरी का आदमी (नाटक)-थम्मन सिंह सरस, यूजिक बुक एजेन्सी, लखनऊ, सं0-1990 ई0
133.शक्ति अर्चन-कृष्णमुरारी लाल मधुकर, कविता संग्रह (प्रकाशित), शशि प्रकाशन प्र्राचीन टिकैतगंज लखनऊ, सं0-1999 ई0.
134.स्नेह बंध-दिनेश प्रताप सिंह, कहानी संग्रह, उपकार साहित्य सदन इलाहाबाद-1993ई0.
135.स्पंदन-अरुणकुमार जैन, कविता संग्रह (प्रकाशित) सं0 1998 ई0.
136. स्मारिका (राजभाषा सन्दर्भ एवं सार पुस्तिका)- मुम्बई मंडल-1999- संपादक- सीमामोहन आसवानी, राजभाषा विभाग, मण्डल रेल प्रबंधक कार्यालय, मुम्बई
137. संधि और विच्छेद- काव्यसंग्रह, दुर्गादत्त त्रिपाठी- दुर्गादत्त त्रिपाठी न्यास, रामभवन, गली नं.-2, दौलतबाग, मुरादाबाद, संसकरण-दिस0-1997.
138. सन्नाटे के बीच-विपिन जैन, कहानी संग्रह ,अभियान प्रकाशन महरौली नई दिल्ली, सं0-1985 ई0.
139. सपने में सपना-दिनेश पाठक ‘शशि बालकहानी संग्रह (प्रकाशित), जाहन्वी प्रकाशन शाहदरा,दिल्ली-32, सं0-2001 ई0.
140. सरहद पर सुलह (कहानी संग्रह)-हरदर्शन सहगल, मेधा बुक्स, नवीन शाहदरा, दिल्ली-32, सं0-1999 ई
141. सकुनी के पांसे-राजवीर खुराना ‘वरन गजल संग्रह प्रकाशित-1995 ई0.
142. सफेद पंखों की उड़ान (उपन्यास)-हरदर्शन सहगल, धरती प्रकाशन वीकानेर, सं0-1984 ई0.
143. साहब बीबी गुलाम- विमल मित्र, राजकमल प्रकाशन दिल्ली, चैथा संस्करण-1989.
144. सुन्दर और सजीले गीत (बालगीत)-गोपीचन्द श्रीनागर, मरिल पब्लिेकेशन, वाराणसी, सं0-1995 ई0.
145. सुन रे मीत नारी के गीत-सन्तोष कुमार सिंह काव्य संग्रह (प्रकाशित), साहित्य वीथी, दिल्ली, सं0-1998 ई0.
146. सुरसतिया- बिमल मित्र-संस्करण-1989, सन्मार्ग प्रकाशन, दिल्ली-7.
147. सुबह का पैगाम-लालसा लाल तरंग,कथा संग्रह, एकता प्रकाशन बरौनी, सं0-1982
149. हवा में लटका सवाल-लालसा लाल तरंग, कथा संग्रह, एकता प्रकाशन बरौनी, सं0-1999 ई0.
150. हवेली-संजीव जायसवाल ‘संजय’, बाल उपन्यास, प्रकाशन विभाग पटियाला हाउस, नई दिल्ली, सं0-2001 ई0.
151. हँसिये-घनश्याम मैथिल अमृत, काव्य क्षणिकाएँ, करवट प्रकाशन भोपाल, -1994 ई0
152. हाथी गया स्कूल-सन्तोष कुमार सिंह, बाल कविताएँ (प्रकाशित), कवि सभा, गाजियाबाद, सं0-2001 ई0.
153. हाँ यह सच है-दिनेश पाठक ‘शशि लघुकथा संग्रह (प्रकाशित), श्री शिवशक्ति प्रकाशन कोसी कलाँ, सं0-2000 ई0.
154. हिन्दी काव्यशास्त्र का इतिहास-डा0 भगीरथ मिश्र, तृतीय संस्करण-संवत् 2022 विक्रमीय, प्रकाशक- लखनऊ विश्व विद्यालय लख्रनऊ.






कोश

1. अभिनव संस्कृत-हिन्दी कोश- संपादक-उदयनारायण तिवारी, संस्करण-1973 ई0, प्रकाशक- हिन्द पाकेट बुक्स प्रा.लि. जी.टी.रोड शाहदरा, दिल्ली-95.
2. कन्नौजी लोकोक्ति एवं मुहावरा कोश- संपादक- डा0 राजकुमार सिंह एवं डा0 जगदीश व्योम, आराधना ब्रदर्स, गोविन्द नगर, कानपुर- संस्करण-1994.
3. बृहद् शिक्षार्थी अंग्रेजी- हिन्दी शब्द कोश- डाॅ0 हरदेव बाहरी, संस्करण-2001ई0, प्रकाशक- राजपाल एण्ड सन्स, कश्मीरी गेट, दिल्ली-6.
4. मानक हिन्दी कोश (खण्ड 1से 5)- प्रधान संपादक-रामचन्द्र वम्र्मा- हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, संस्करण-1964ई.
5. मानक हिन्दी पर्याय कोश- डा0 हरदेव बाहरी, संस्करण-2002 ई0, प्रकाशक- विद्याप्रकाशन मंदिर, 1681 दरियागंज, नई दिल्ली-110002.
6. संस्कृत-हिन्दी कोश- वामन शिवराम आप्टे, द्वितीय संस्करण-1969, प्रकाशक- मोतीलाल बनारसीदास, बंगलारोड, जवाहरनगर, दिल्ली-77.
7. हिन्दी साहित्य कोश, भाग-1, प्रधान संपादक- डाॅ0 धीरेनद्र वर्मा, तृतीय संस्करण-1985ई0, ज्ञानमण्डल लिमिटेड, संत कबीर रोड, वाराणसी-1.
8. हिन्दी साहित्य कोश, भाग-2, प्रधान संपादक- डाॅ0 धीरेन्द्र वर्मा, तृतीय संस्करण-1985ई0, ज्ञानमण्डल लिमिटेड, संत कबीर रोड, वाराणसी-1.
9. व्यावहारिक हिन्दी शब्द कोश- संपादक-उदयनारायण तिवारी, संस्करण-1973, प्रकाशक- हिन्दी पाॅकेट बुक्स, जी.टी.रोड, शाहदरा, दिल्ली-95.





पत्रिकाएँ-

1. अतएव- सं0 डा0 विद्याविन्दु सिंह-राजर्षि पुरुषोत्तम टण्डन हिन्दी भवन 6, महात्मा गांधी मार्ग, लखनऊ, अंक-जन0-फर0-1999.
2. अंकुर- राजभाषा अनुभाग, डीजल कलपुर्जा कारखाना, पटियाला, अंक-अक्टू0-1996.
3. अजंता-मंडल रेल प्रबंधक कार्यालय (राजभाषा विभाग), भुसावल, महाराष्ट्र, अंक-1998.
4. अभिषेक- हिन्दी अनुभाग, उ0रे0 वर्कशाप, लालगढ़, वीकानेर-4, अंक-अक्टू0-दिस0-1993.
5. इमेज प्रतिबिम्ब- मुख्य जनसंपर्क अधिकारी, मंडल रेल प्रबंधक कार्यालय,द0म0रेलवे, हुबली, अंक-अप्रैल-सित0-1999.
6. इरकान समाचार-इरकान इन्टरनेशनल लि0 पालिका भवन, सेक्टर-12 आर.के.पुरम्, नई दिल्ली-66, अंक-अगस्त एवं नव.-2000.
7. इरिसेट तरंग शिक्षा- भारतीय रेल सिगनल इंजीनियरी और दूरसंचार संस्थान सिकन्दराबाद, अंक- मार्च-2001.
8. कर्मवीर- रेल इंजन कारखाना, जमालपुर, मुंगेर, पूर्व रेलवे, विहार., अंक-1995.
9. कादम्बिनी- 18-20, कस्तूरबा गांधी मार्ग, नई दिल्ली-1, अंक-दिसम्बर-1997.
10. कानकोर-भारतीय कंटेनर निगम लिमिटिड, कन्ष्कि प्लाजा, 19, अशोक रोड, नई दिल्ली-1, अंक-जून-जुला0-1999.
11. कारवां- मंडल रेल प्रबंधक कार्यालय, पूर्व रेलवे, सियालदह, कलकŸाा-14, अंक- जन0-मार्च-1993.
12. कारखाना- अक्षर विहार, अवन्तिका मार्ग, जमालपुर (विहार), अंक-22.
13. किसलय- राजभाषा अनुभाग, मण्डल कार्यालय, पूर्व रेलवे, धनबाद, अंक-2001.
14. चेतना- मण्डल रेल प्रबंधक कार्यालय, राजभाषा अनुभाग, मैट्रो रेल कलकŸाा, अंक2, वर्ष-2000.
15. जीवन मार्ग- मुख्य जनसंपर्क अधिकारी 14-16 गवर्नमेण्ट प्लेस ईस्ट कोलकाता-69, अंक-फरवरी 2001.
16. डी.रे.का. दर्पण- डीजल रेल इंजन कारखाना, वाराणसी, अंक-जन0-जून0-2001.
17. डीयर सोवेनियर- सी-203, कमल अपार्टमेण्ट, हीरा नगर, मुलुण्ड(प0), अंक-सित0-1994.
18. दक्षिण ध्वनि- दक्षिण रेलवे, प्रधन कार्यालय, पार्क टाउन, चैन्नई, अंक-अप्रैल-दिस0-1998.
19. प्रतिबिम्ब- पूर्व रेलवे प्रधन कार्यालय, 17 नेताजी सुभाष रोड, कलकŸाा, अंक-जुलाई-दिस0-2000.
20. पुष्पांजंलि- राजभाषा विभाग, द0पू0 रेलवे, खड़गपुर कारखाना, अंक-अप्रैल 1998.
21. भारतीय रेल पत्रिका-संपादक- प्रमोदकुमार यादव, रेलमंत्रालय, रेलवे बोर्ड, कमरा नं0-309, रायसीना रोड, नई दिल्ली-1. अंक-जन0-सित0 2000.
22. भावना पत्रिका- राजभाषा, मण्डल रेल प्रबंधक कार्यालय, भावनगर. अंक-1995.
23. मानक रश्मि- राजभाषा विभाग, अनुसंधान अभिकल्प और मानक संगठन, मानक नगर, लखनऊ-226011 अंक- जन-मा0-1998.
24. राजभाषा भारती- राजभाषा विभाग, गृहमंत्रालय लोकनायक भवन, 11वां तल खान मार्केट, नई दिल्ली-3., अंक-अक्टू0-दिस0-1993.
25. राजभाषा पुष्पमाला- राजभाषा विभाग, गृहमंत्रालय लोकनायक भवन, 11वां तल खान मार्केट, नई दिल्ली-3., अंक-जून-1997.
26. रेल पुष्प- मंडल रेल प्रबंधक कार्यालय (राजभाषा विभाग) भुसावल, महाराष्ट्र, अंक-1982.
27. रेल भारती- महाप्रबंधक कार्यालय (राजभाषा विभाग) चर्चगेट बम्बई, अंक-मार्च-1996.
28. रेल रसना- मण्डल रेल प्रबंधक कार्यालय, पूर्व रेलवे हावड़ा, अंक-2001.
29. रेल राजभाषा-संपादक-डा0 महेशचन्द्र गुप्त, राजभाषा निदेशालय, रेलमंत्रालय, रेलवे बोर्ड, कमरा नं0-544, रायसीना रोड, नई दिल्ली-1., अंक-जन0-जून0 2001.
30. रेलवाणी- दानापुर मंडल कार्यालय, खगौल दानापुर, अंक-जन0-जून0-2000.
31. रेल संदेशिका-मंडल रेल प्रबंधक कार्यालय,(राजभाषा विभाग), मध्य रेल झाँसी, अंक-राजभाषा स्वर्ण जयन्ती विशेषांक.
32. रेलसुधा- दक्षिण मध्य रेलवे, रेल निलयम, चैथी मंजिल, सिकंदराबाद-500071, अंक-जन0-जून-1999, जुला0-दिस0-1999.
33. रेल सुरभि- राजभाषा विभाग, महाप्रबंधक कार्यालय, चैथा माला, मुम्बई वी.टी. अंक- जुला0-दिस0 1999.
34. लोकोदीप-विद्युत लोकोशेड, कल्याण, महाराष्ट्र, प्रवेशांक- 1999.
35. वाणी विलास- मुख्य कारखाना प्रबंधक (राजभाषा विभाग) अजमेर (प0रे0), अंक-1992.
36. विशाख वाणी- मंडल रेल प्रबंधक कार्यालय (राजभाषा विभाग) दक्षिण पूर्व रेलवे, वालतेरु, विशाखापट्टनम-4, अंक-12, जून-सित0-2000.
37. संकेत- अनुसंधान, न्यू माडल कालोनी, बरेली, अंक-जन0-1999.
38. संदेश- हिन्दी अनुभाग संचालन भवन, दक्षिण मध्य रेलवे, सिकन्दराबाद, अंक-दिस0-1999.
39. सबके दावेदार- सीताराम, आजमगढ़, नव0-1999.
40. स्मारिका- सं0 अरविन्द वर्मा- बेसिक कर्षण वितरण प्रशिक्षण केन्द्र मध्य रेल मथुरा जं., अंक-22, अप्रैल-1994.
41. सम्मेलन पत्रिका, लोक संस्कृति अंक-संपादक- श्री रामनाथ सुमन, पुनर्वार मुद्रित, ई0 सन् 1974, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग.
42. सर्वश्रेष्ठ- कर्षण मशीन कारखाना, नासिक रोड, अंक-1999.
43. सरस्वती पत्रिका-सं0 आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी.
44. सरस्वती संगम- राजभाषा अनुभाग, उत्तर रेलवे, प्रधान कार्यालय, बड़ौदा हाउस, नई दिल्ली, अंक-सित0-1999.
45. हमराही- पायोनियर एडवर टाइजर्स, एस0 3,4,5,6, विकासदीप विल्डिंग, 22 स्टेशनरोड, लखनऊ, अंक-अगस्त-1997.
46. हाइकु दर्पण- संपादक- डा0 जगदीश व्योम, बी-74, के.वि.परिसर प्र.का.का. होशंगाबाद, म.प्र., अंक-अगस्त-2001 एवं मई-2002.

20 August 2009

मन के झरोखे से

मन के झरोखे से झाँकती थी कविता
इस बार सावन में, मुझको सुनाएँगे
हम ने भी मन में, बना ली योजना
"बरखा बहार" नामक, कविता सुनाएँगे।


पर क्या पता था कि, रूठेंगे इन्द्रदेव
सावन में बूँदों की, रिमझिम न लाएँगे
"बरखा बहार" कैद, दिल में ही रह गई
अब जाने कब उसको, मुक्ति दिलवाएँगे।


बिन कविता कवि, कैसे कटेगा सावन
मंदिर में भोले को, पीड़ा बताएँगे
सागर का सरिता से, मिलन है जरूरी
गोरी को ब्रज की क्या, झूला झुलाएँगे।


आर्तनाद कविमन का, सुनाना पड़ेगा
कविता के अश्रु देख, मेघ सहम जाएँगे
नहीं तो कहेगा फिर, इनको कौन मेघदूत
कैसे कवि इन पर, कलम चलाएँगे।



विनती "फकीरा" की, सुनिए जी इन्द्रदेव
नहीं तो हम भी फिर, धूनी रमाएँगे
सुनकर पुकार मेरी, कान्हा जो आ गए
मुरली की धुन पर, मेघ बरसाएँगे।


हो गई जो किरकिरी, फिर कहते रहना
ब्रज के "फकीरा" से न, कभी टकराएँगे
विनती जो मुझ कवि की, सुन लोगे इन्द्रदेव
सभी भारतवासी तुम्हें, शीश झुकाएँगे।

-के. पी. सिंह "फकीरा"

14 August 2009

याद शहीदों की

स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर श्रीकृष्ण सरल की एक कविता ----


मैं अमर शहीदों का चारण
उनके गुण गाया करता हूँ
जो कर्ज राष्ट्र ने खाया है,
मैं उसे चुकाया करता हूँ।

यह सच है, याद शहीदों की हम लोगों ने दफनाई है
यह सच है, उनकी लाशों पर चलकर आज़ादी आई है,
यह सच है, हिन्दुस्तान आज जिन्दा उनकी कुर्वानी से
यह सच अपना मस्तक ऊँचा उनकी बलिदान कहानी से।

वे अगर न होते तो भारत मुर्दों का देश कहा जाता,
जीवन ऍसा बोझा होता जो हमसे नहीं सहा जाता,
यह सच है दाग गुलामी के उनने लोहू सो धोए हैं,
हम लोग बीज बोते, उनने धरती में मस्तक बोए हैं।
इस पीढ़ी में, उस पीढ़ी के
मैं भाव जगाया करता हूँ।
मैं अमर शहीदों का चारण
उनके यश गाया करता हूँ।

यह सच उनके जीवन में भी रंगीन बहारें आई थीं,
जीवन की स्वप्निल निधियाँ भी उनने जीवन में पाई थीं,
पर, माँ के आँसू लख उनने सब सरस फुहारें लौटा दीं,
काँटों के पथ का वरण किया, रंगीन बहारें लौटा दीं।

उनने धरती की सेवा के वादे न किए लम्बे—चौड़े,
माँ के अर्चन हित फूल नहीं, वे निज मस्तक लेकर दौड़े,
भारत का खून नहीं पतला, वे खून बहा कर दिखा गए,
जग के इतिहासों में अपनी गौरव—गाथाएँ लिखा गए।
उन गाथाओं से सर्दखून को
मैं गरमाया करता हूँ।
मैं अमर शहीदों का चरण
उनके यश गाया करता हूँ।

है अमर शहीदों की पूजा, हर एक राष्ट्र की परंपरा
उनसे है माँ की कोख धन्य, उनको पाकर है धन्य धरा,
गिरता है उनका रक्त जहाँ, वे ठौर तीर्थ कहलाते हैं,
वे रक्त—बीज, अपने जैसों की नई फसल दे जाते हैं।

इसलिए राष्ट्र—कर्त्तव्य, शहीदों का समुचित सम्मान करे,
मस्तक देने वाले लोगों पर वह युग—युग अभिमान करे,
होता है ऍसा नहीं जहाँ, वह राष्ट्र नहीं टिक पाता है,
आजादी खण्डित हो जाती, सम्मान सभी बिक जाता है।
यह धर्म—कर्म यह मर्म
सभी को मैं समझाया करता हूँ।
मैं अमर शहीदों का चरण
उनके यश गाया करता हूँ।

पूजे न शहीद गए तो फिर, यह पंथ कौन अपनाएगा?
तोपों के मुँह से कौन अकड़ अपनी छातियाँ अड़ाएगा?
चूमेगा फन्दे कौन, गोलियाँ कौन वक्ष पर खाएगा?
अपने हाथों अपने मस्तक फिर आगे कौन बढ़ाएगा?

पूजे न शहीद गए तो फिर आजादी कौन बचाएगा?
फिर कौन मौत की छाया में जीवन के रास रचाएगा?
पूजे न शहीद गए तो फिर यह बीज कहाँ से आएगा?
धरती को माँ कह कर, मिट्टी माथे से कौन लगाएगा?

मैं चौराहे—चौराहे पर
ये प्रश्न उठाया करता हूँ।
मैं अमर शहीदों का चारण
उनके यश गाया करता हूँ।
जो कर्ज राष्ट्र ने खाया है,
मैं उसे चुकाया करता हूँ।

***

-श्रीकृष्ण सरल

श्रीकृष्ण जन्म

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर कृष्ण के जन्म की सूचना सुनकर एक गोपी भाव विभोर हो जाती है। गोपी के माध्यम से सूरदास ने बहुत ही सुन्दर शब्दों में इसका चित्रण किया है। इस पद में बाल कृष्ण के अद्भुत सौन्दर्य का चित्रण हुआ है और उसे ब्रज की गली-गली में बहने वाली सौन्दर्य की नदी का रूपक दिया गया है। प्रस्तुत है सूरदास का यही पद-






सोभा-सिन्धु न अंत रही री ।
नंद-भवन भरि पूरि उमँग चलि, ब्रज की बीथिनि फिरति बही री।।
देखी जाइ आजु गोकुल मैं, घर-घर बेंचति फिरति दही री ।
कहँ लगि कहौं बनाइ बहुत बिधि, कहत न मुख सहसहुँ निबही री ।।
जसुमति-उदर-अगाध-उदधि तैं, उपजी ऍसी सबनि कही री ।
सूरस्याम प्रभु इन्द्र-नीलमनि, ब्रज-बनिता उर लाइ गही री ।।

-सूरदास

03 August 2009

बरखा बहार



श्री के.पी.सिंह उच्च न्यायिक सेवा के अन्तर्गत अपर जिला न्यायाधीश के पद पर कार्यरत हैं। वे " के.पी. सिंह फकीरा" के नाम से कविता लिखते हैं। इस समय ग्वालियर में हैं। दोहे लिखने और उनके सस्वर पाठ करने में उन्हें महारत हासिल है। उनके ब्लाग से उनकी "बरखा बहार" शीर्षक कविता यहाँ प्रस्तुत की जा रही है। प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।



बरखा बहार

सुन-सुनकर बूँदों की रिमझिम, लगा बजे वीणा के तार
ओढ़ चुनरिया गर्मी भागी, ठण्डी-ठण्डी बहे बयार
काले-काले मेघ लगें यों, नभ में नाच रहे गजराज
कौंध-कौंध कर बिजली मानो, तम पर ही कर रही प्रहार ।
ओढ़ चुनरिया ........................ ।।


मीठे बोल पपीहा बोले, मोर नाचते पंख पसार
रात में मेंढक राग अलापें, बजे झींगुरों की झंकार
सरिता भाग चली मिलने को, अपने प्रियतम सागर से
जहाँ भी देखो वहीं दिखे है, सारे जहाँ में प्यार ही प्यार।
ओढ़ चुनरिया ........................ ।।


हरियाली की चादर फैली, नाच उठे सब वन-उपवन
पेड़ों पर पड़ गये हैं झूले, गोरी गायें राग मल्हार
बम-बम भोले का जयकारा, गूंज उठा शिव-मंदिर में
बेल-पत्र और पुष्प चढ़ाने, भक्तों की है लगी कतार ।
ओढ़ चुनरिया ........................ ।।


जान पड़ गई है खेतों में, दमक उठा पीला सोना
भूमि-पुत्र का चेहरा देखो, आया है उस पर निखार
मधुर राग सुनकर रिमझिम का, गाये ये मतवाला मन
सभी की नजरें तुम्हें निहारें, स्वागत है बरखा बहार ।
ओढ़ चुनरिया ........................ ।।

-के.पी.सिंह "फकीरा"

के.पी. सिंह "फकीरा" जी की अन्य कविताएँ आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

27 June 2009

हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण

हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण

हिन्दी संघ और कुछ राज्यों की राजभाषा स्वीकृत हो जाने के फलस्वरूप देश के भीतर और बाहर हिन्दी सीखने वालों की संख्या में पर्याप्त वृद्धि हो जाने के कारण हिन्दी वर्तनी की मानक पद्धति निर्धारित करना आवश्यक और कालोचित जान पड़ा ताकि हिन्दी शब्दों की वर्तनियों में अधिकाधिक एकरूपता लाई जा सके। तदनुसार, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार ने १९६१ में हिन्दी वर्तनी की मानक पद्धति निर्धारित करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति नियुक्त की। इस समिति बनाई जिसने अप्रैल १९६२ में अंतिम रिपोर्ट दी। इस समिति के सदस्यों की सूची परिशिष्ट में दी गई है।
समिति की चार बैठकें हुईं जिनमें गंभीर विचार-विमर्श के बाद वर्तनी के संबंध में एक नियमावली निर्धारित की गई। समिति ने तदनुसार, १९६२ में अपनी अंतिम सिफारिशें प्रस्तुत कीं जो सरकार द्वारा अनुमोदित रूप में नीचे दी जा रही हैं-

1. हिन्दी के विभक्ति-चिह्न सर्वनामों के अतिरिक्त सभी प्रसंगों में प्रातिपदिक से प्रथक लिखे जाएँ। जैसे राम ने, स्त्री को,मुझ को।
परन्तु प्रेस की सुविधाओं को ध्यान में रखकर पत्र-पत्रिकाओं में संज्ञादि शब्दों में भी विभक्तियाँ मिलाने की छूट रहे।

अपवाद-
(क) सर्वनामों के साथ यदि दो विभक्ति-चिह्न हों तो उनमें से पहला मिलाकर और दूसरा पृथक लिखा जाए। जैसे- उसके लिए, इसमें से।

(ख) सर्वनाम और विभक्ति के बीच "ही" , "तक" आदि का निपात हो तो विभक्ति को पृथक लिखा जाए, जैसे- आप ही के लिए, मुझ तक को।

२. संयुक्त क्रियाओं में सभी अंगभूत क्रियाएँ पृथक-पृथक लिखी जाएँ, जैसे- पढ़ा करता है, आ सकता है।

३. "तक", "साथ" आदि अव्यय सदा पृथक लिखे जाएँ, जैसे- आपके साथ, यहाँ तक ।

४. पूर्वकालिक प्रत्यय "कर" क्रिया से मिलाकर लिखा जाए, जैसे- मिलाकर, खा-पीकर, रो-रोकर।

५. द्वंद्व समास में पदों के बीच में हाइफन रखा जाए, जैसे- राम-लक्ष्मण, शिव-पार्वती-संवाद।

६. सा, जैसा आदि से पूर्व हाइफन रखा जाए, जैसे- तुम-सा, राम-जैसा, चाकू-से तीखे।

७. तत्पुरुष समास में हाइफन का प्रयोग केवल वहीं किया जाए, जहाँ उसके बिना भ्रम होने की संभावना हो, अन्यथा नहीं, जैसे- भू-तत्त्व, रामराज्य।

८. जहाँ श्रुतिमूलक य-व का प्रयोग विकल्प से होता है वहाँ न किया जाए, अर्थात् किए- गये, नई-नयी, हुआ-हुवा आदि में से पहले (स्वरात्मक) रूपों का ही प्रयोग किया जाए। यह नियम क्रिया, विशेषण, अव्यय आदि सभी रूपों में माना जाए।

९. हिन्दी में "ऐ", "औ" का प्रयोग दो प्रकार की ध्वनियों को व्यक्त करने के लिए होता है। पहले प्रकार की ध्वनियाँ हैं, "है", "और" आदि में हैं तथा दूसरे प्रकार की "गवैया", "कौवा" आदि में। इन दोनों ही प्रकार की ध्वनियों को व्यक्त करने के लिए इन्हीं चिह्नों (ऐ, औ) का प्रयोग किया जाए "गवय्या", "कव्वा" आदि संशोधनों की आवश्यकता नहीं।

१०. संस्कृतमूलक तत्सम शब्दों की वर्तनी में सामान्यतः संस्कृत रूप ही रखा जाए परन्तु जिन शब्दों के प्रयोग में हिन्दी में हलन्त चिह्न लुप्त हो चुका है उनमें उसको फिर से लगाने का यत्न न किया जाए, जैसे- महान, विद्वान आदि में।

११. जहाँ पंचमाक्षर के बाद उसी के वर्ग के शेष चार वर्णों में से कोई वर्ण हो वहाँ अनुस्वार का ही प्रयोग किया जाए, जैसे- गंगा, वाङ्मय, संपादक, साम्य, सम्मति।

१२. चन्द्रबिंदु के बिना प्रायः अर्थ में भ्रम की गुंजायश रहती है, जैसे- हंस, हँस॥ अंगना, अँगना आदि में। अतएव ऐसे भ्रमों को दूर करने के लिए चन्द्रबिन्दु का प्रयोग अवश्य किया जाना चाहिए। किंतु जहाँ चन्द्रबिन्दु कस प्रयोग से छपाई आदि में बहुत कठिनाई हो और चन्द्रबिन्दु के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग किसी प्रकार का भ्रम उत्पन्न न करे वहाँ चन्द्रबिन्दु के स्थान पर अनुस्वार के प्रयोग की भी छूट दी जा सकती है, जैसे- नहीं, में, मैं। परंतु कविता आदि के ग्रंथों में छंद की दृष्टि से चन्द्रबिन्दु का यथास्थान अवश्य प्रयोग किया जाए। इसी प्रकार छोटे बच्चों की प्रवेशिकाओं में जहाँ चन्द्रबिन्दु का उच्चारण सिखाना अभीष्ट हो वहाँ उसका यथासथान सर्वत्र प्रयोग किया जाए, जैसे- नहीं, में, मैं, नँद-नंदन।

१३. अरबी-फारसी मूलक वे शब्द जो हिन्दी के अंग बन चुके हैं और जिनकी विदेशी ध्वनियों का हिन्दी ध्वनियों में रूपांतर हो चुका है, हिन्दी रूप में ही स्वीकार किए जाएं, जैसे- जरूर। परन्तु जहाँ पर उनका शुद्ध विदेशी रूप में प्रयोग अभीष्ट हो वहाँ उनके हिन्दी में प्रचलित रूपों में यथास्थान नुक्ते लगाए जाएं, जिससे उनका विदेशीपन स्पष्ट रहे, जैसे- राज़, नाज़।

१४. अँग्रेजी के जिन शब्दों में अर्ध विवृत "औ" ध्वनि का प्रयोग होता है उनके शुद्ध रूप का हिन्दी में प्रयोग अभीष्ट होने पर "आ" की मात्रा के ऊपर अर्धचन्द्र का प्रयोग किया जाए।

१५. संस्कृत के जिन शब्दों में विसर्ग का प्रयोग होता है वे यदि तत्सम रूप में प्रयुक्त हों तो विसर्ग का प्रयोग अवश्य किया जाए, जैसे- "दुःखानुभूति" में। परन्तु यदि उस शब्द के तद्भव रूप में विसर्ग का लोप हो चुका हो तो उस रूप में विसर्ग के बिना भी काम चल जाएगा।

12 April 2009

जितेन साहू की कविताएँ (दो)


चिट्ठाजगत







लड़की


एक लड़की
खामोश नदी
एक लड़की
बंद किवाड़
एक लड़की
लड़की होने के अलावा भी
बहुत कुछ है
अगर बची रहे साजिश से ...।

-जितेन साहू

11 April 2009

जितेन साहू की कविताएँ (एक)


चिट्ठाजगत


स्वप्न में डूबी लड़की

स्वप्न में डूबी लड़की
रुई से भी हल्की हो
उड़ जाती है आकाश में

स्वप्न में डूबी लड़की
कर नहीँ पाती अहसास
खुरदुरेपन का
स्वप्न में डूबी लड़की
काटती है हर बंधन को।

-जितेन साहू

14 January 2009

साल शुरु हो दूध दही से


चिट्ठाजगत




नव वर्ष 2009 पर सभी को हार्दिक शुभकामनाओं के साथ भवानी प्रसाद मिश्र की एक प्रसिद्ध बाल कविता प्रस्तुत है-

साल शुरु हो दूध दही से
साल खत्म हो शक्कर घी से
पिपरमैन्ट, बिस्कुट मिसरी से
जहें लबालब दोनों खीसें
मस्त रहें सडकों पर खेलें
नाचें कूदें गाएँ ढेलें
ऊधम करें मचाएँ हल्ला
रहें सुखी भीतर से जी से
साँझ, रात, दोपहर, सवेरा
सब में हो मस्ती का डेरा
कातें सूत बनाएँ कपडे
दुनिया में क्यों डरें किसी से
पंछी गीत सुनाएँ हमको
करं दोस्ती पेड फूल से
लहर लहर से नदी नदी से
आगे पीछे ऊपर नीचे
रहें हँसी की रेखा खींचे
पास पडोस गाँव घर बस्ती
प्यार ढेर भर करं सभी से।
-भवानी प्रसाद मिश्र

21 December 2008

हाइकु दिवस समाचार के कुछ लिंक

हाइकु दिवस समारोह दिनांक ०४ दिसम्बर २००८ को साहित्य अकादमी दिल्ली में मनाया गया। जिन पत्र-पत्रिकाओं एवं जालघरों के संपादकों ने हाइकु दिवस समाचार को प्रकाशित किया है, हम उनके आभारी हैं। यहाँ हाइकु पाठकों की सुविधा के लिए लिंक दिए जा रहे हैं जिससे सम्बधित समाचार को यहाँ देखा जा सकता है।
-व्योम

* द गौर संस टाइम्स गाजियाबाद
* ब्लाग वानी
* कविता कोश
* हाइकु दिवस इलाहाबाद
* सहज साहित्य पर
* अनुभूति/अभिव्यक्ति पर समाचार

* साहित्य कुंज में gggggg

* गर्भनाल

www.geocities.com/pysh_123/Garbhanalpdf.pdf

07 December 2008

हाइकु दिवस समारोह -2008

हाइकु दिवस समारोहदुनिया में सबसे अधिक चर्चित एवं आकार की दृष्टि से सर्वाधिक छोटी मात्र १७ अक्षर की कविता 'हाइकु` पर केन्द्रित 'हाइकु दिवस` का आयोजन साहित्य अकादमी नई दिल्ली के सभागार में ०४ दिसम्बर को किया गया।


















रवीन्द्र नाथ टैगोर और उनके बाद अज्ञेय जी ने अपनी जापान यात्राओं से वापस आते समय जापानी हाइकु कविताओं से प्रभावित होकर उनके अनुवाद किए जिनके माध्यम से भारतीय हिन्दी पाठक 'हाइकु` के नाम से परिचित हुए। इसके बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली में जापानी भाषा के पहले प्रोफेसर डॉ० सत्यभूषण वर्मा(04-12-1932 ....... 13-01-2005) ने जापानी हाइकु कविताओं का सीधा हिन्दी में अनुवाद करके भारत में उनका प्रचार-प्रसार किया। इससे पूर्व हाइकु कविताओं के जो अनुवाद आ रहे थे वे अंगे्रजी के माध्यम से हिन्दी में आ रहे थे प्रो० वर्मा ने जापानी हाइकु से सीधा हिन्दी अनुवाद करके भारत मे उसका प्रचार-प्रसार किया। परिणामत: आज भारत में हिन्दी हाइकु कविता लोकप्रिय होती जा रही है। अब तक लगभग ४०० से अधिक हिन्दी हाइकु कविता संकलन प्रकाशित हो चुके हैं और निरन्तर प्रकाशित हो है। प्रो० सत्यभूषण वर्मा के जन्म दिन ४ दिसम्बर कैं हाइकु दिवस के रूप मे मनाने का प्रारम्भ हाइकु कविता की पत्रिका `हाइकु दर्पण' ने २००६ से गाजियाबाद से किया। हाइकु दर्पण के संपादक डॉ० जगदीश व्योम, कमलेश भट्ट कमल एवं डॉ० अंजली देवधर द्वारा हिन्दी हाइकु कविता की गुणवत्ता में सुधार हेतु निरन्तर प्रयास किए जा रहे है। इसी श्रृंखला में यह आयोजन किया गया। हाइकु दिवस समारोह के अध्यक्ष सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ० प्रभाकर श्रोत्रिय ने दीप प्रज्ज्वलन कर समारोह का शुभारम्भ किया। मुख्य अतिथि श्री विजय किशोर मानव (संपादक कादम्बिनी) ने कहा कि हाइकु कविता मन की अतल गहराईयों कैं प्रभावित कर सके ऐसा प्रयास करना चाहिए। विशिष्ट अतिथि आकाशवाणी के केन्द्र निदेशक लक्ष्मीशंकर वाजपेई ने कहा कि हाइकु मन की अनुभूति की कम शब्दों में व्यक्त करने का सर्वाधिक सशक्त माध्यम है। उन्होंने अपनी आकाशवाणी की गोष्ठियों में हाइकु पाठ के लिए भी हाइकुकारों कैं आमंत्रित किए जाने की योजना विषयक जानकारी दी तथा डोगंरी भाषा मे लिखी जा रही हाइकु कविताओं की चर्चा की। विशिष्ट अतिथि डॉ० अंजली देवधर ने अंग्रेजी एवं अन्य भाषाओं में लिखे जाने वाली हाइकु कविताओं की चर्चा करते हुए दुनिया के तमाम देशों में आयोजित हाइकु संगोष्ठियों में भारतीय हाइकु व हिन्दी हाइकु की उपस्थिति व मान्यता विषयक जानकारी देते हुए बताया कि बंगलोर में आयोजित अंग्रेजी भाषा के विश्व हाइकु सम्मेलन में पहली बार हाइकु दर्पण के संपादक को हिन्दी में हाइकु की स्थिति पर शोधपत्र प्रस्तुत करने हेतु आमंत्रित किया गया। कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रभाकर श्रोत्रिय ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि शब्द जैसे-जैसे कम होते जाते है कविता सघन होकर और प्रभावशाली होती जाती है। हाइकु में कम शब्द होते है वहाँ किसी निरर्थक शब्द या अक्षर की गुंजाइश नहीं है इसीलिए एक अच्छा हाइकु बहुत प्रभावशाली होता है। हाइकु दर्पण पत्रिका के संपादक एवं हाइकु दिवस समारोह के संयोजक डॉ० जगदीश व्योम ने विश्व स्तर पर हिन्दी हाइकु की स्थिति की जानकारी दी। इण्टरनेट पर हिन्दी हाइकु के विषय में बताते हुए डा० व्योम ने कहा कि हिन्दी की सर्वाधिक लोकप्रिय वेबसाइट- अनुभूति एवं अभिव्यक्ति की संपादक पूर्णिमा वर्मन (यू.ए.ई.) ने हाइकु माह जैसे आयोजन किया तथा हाइकु की कार्यशाला आयोजित की और प्रतिदिन एक चुनिन्दा हाइकु चित्र सहित वेबसाइट पर प्रकाशित किया जिन्हें हजारों वेब पाठकों ने प्रतिदिन पढ़ा और सराहा। हिन्दी की अनेक वेबसाइट्स हैं जिन पर हाइकु कविताएँ निरंतर प्रकाशित की जा रही है? कार्यक्रम का संचालन कर रहे प्रसिद्ध हाइकुकार एवं साहित्यकार कमलेशभट्ट कमल ने हाइकु लेखन पर समग्र दृष्टि डालते हुए बताया कि आज के व्यस्ततम समय में मन के अनुभावों को व्यक्त करने के लिए अधिक समय किसी के पास नहीं है ऐसे में हाइकु कविता सर्वाधिक उपयोगी तथा समसामयिक है। प्रो० वर्मा के साथ हमेशा से जुड़े रहे कमलेश भट्ट कमल ने हिन्दी हाइकु यात्रा विषयक विस्तृत जानकारी दी तथा हाइकु १९८९, हाइकु १९९९ जैसे ऐतिहासिक संकलनों के संपादन के बाद प्रस्तावित हाइकु २००९ के संपादन विषयक जानकारी देते हुए हाइकुकारों से हाइकु भेजने हेतु कहा। ओमप्रकाश चतुर्वेदी पराग ने हाइकु कविता को ५-७-५ अक्षरक्रम में मात्र १७ अक्षर तक सीमित रखने विषयक अनुशासन पर प्रश्न उठाया। इस अवसर पर प्रो० सत्यभूण वर्मा की जीवन संगिनी श्रीमती सुरक्षा वर्मा की गरिमामय उपस्थित समारोह का आकर्षण रही।
डा० अंजली देवधर को विभिन्न देशों व भाषाओं में हिन्दी हाइकु का प्रचार-प्रसार करने तथा श्रीमती सुरक्षा वर्मा को प्रो० सत्यभूषण वर्मा द्वारा छोडी गई हाइकु यात्रा को निरन्तर आगे बढाने की दिशा में सतत सहयोग देने के लिए समारोह के अध्यक्ष प्रभाकर श्रोत्रिय तथा मुख्यअतिथि कादम्बिनी के संपादक विजय किशोर मानव द्वारा शाल उढाकर सम्मानित किया गया।





समारोह में हाइकुकारों ने हाइकु कविताओं का पाठ कर जनसमूह को प्रभावित किया। हाइकु पाठ करने वालों में सर्वश्री- डॉ० कुअँर बेचैन, डॉ० सरिता शर्मा, पवन जैन(लखनऊ), अरविन्द कुमार, लक्ष्मीशंकर वाजपेई, ओम प्रकाश चतुर्वेदी पराग, कमलेश भट्ट कमल, डॉ० जगदीश व्योम, सुजाता शिवेन(उड़िया कवयित्री), ममता किरण वाजपेई, प्रदीप गर्ग आदि प्रमुख थे।हाइकु दिवस समारोह में सुप्रसिद्ध साहित्यकार से.रा.यात्री, सुप्रसिद्ध गजलकार ज्ञान प्रकाश विवेक, इंडिया न्यूज पत्रिका के सहायक संपादक अशोक मिश्र, बी. एल. गौड़, साहित्यकार डॉ० अरुण प्रकाश ढौंढ़ियाल, हरेराम समीप, अमरनाथ अमर, डॉ० तारा गुप्ता, श्रीमती ज्योति श्रोत्रिय, ब्रजमोहन मुदगल, एस.एस.मावई, श्रीमती मावई, श्रीमती अलका यादव, शिवशंकर सिंह, सुधीर, प्रत्यूष, ममता किरन, मृत्युंजय साधक, नीरजा चतुर्वेदी आदि उपस्थित रहे। अन्त में धन्यवाद ज्ञापन संयोजक डॉ० जगदीश व्योम ने किया।









26 May 2008

चन्द्रशेखर आजाद : कुछ अछूते प्रसंग

बाल्य-काल में आजाद को पेडों पर चढकर गुलाम-डण्डा खेलने का बहुत शॉक था। भील बालकों के साथ तीर-कमठे लेकर निशानेबाजी का अच्छा अभ्यास आजाद ने कर लिया था। आजाद को शिकार खेलने का बचपन में ही शॉक लग गया था।
क्रान्तिकारी जीवन में अपने बचपन के साथियों से वे कहा करते थे कि बचपन में उन्हें शेर का मांस खिलाया गया था। आजाद झूठ बोलना या गप लडाना जानते ही नहीं थे। भीतर ऑर बाहर जो था एक सा था।
ओरछा के जंगल में एक बार अज्ञातवास के समय साधुवेश में उन्हें पुलिस वालों ने पकडकर पूछा था कि- "तुम्हीं आजाद हो ?" तो आजाद ने बिना झूठ बोले कह दिया था-
"हाँ भॅया, हम आजाद नहीं तो क्या हॅ, सभी साधु आजाद होते हॅ। हम किसी के बाप के गुलाम थोडे ही हॅ। हनुमान जी की चाकरी करते हॅ ऑर आजाद रहते हॅ।" पुलिस वाले साधु महाराज को छोडकर चले गए थे।
''उनका कथन बचपन में उन्हें शेर का मांस खिलाया गया था, सत्य ही हॅ। भीलों के साथ कई बार वे शेर के शिकार में शामिल होते थे। ऑर एक-दो बार अपनी धाक जमाने के लिए कि "शेर का मांस मुझे हानि नहीं पहुँचा सकता, उन्होंने तीख मं आकर शेर का मांस खाया भी था। वॅसे बहुत गर्म होने के कारण शेर का मांस खाया नहीं जाता हॅ।''
साभार
- ( श्रीकृष्ण सरल, महाकाव्य ग्रंथावली, प्रथम संस्करण- २७ फरवरी १९९२ ई०, प्रकाशक बलिदान भारती, २७ दशहरा मैदान, उज्जैन (म०प्र०)

04 May 2008

हाइकु-2009 हेतु रचनाएँ आमंत्रित


’हाइकु-1989‘ व ’हाइकु-1999‘ नामक चर्चित संकलनों के बाद हाइकु की हिन्दी में प्रथम चर्चा के स्वर्ण जयन्ती वर्ष 2009 में प्रकाशन हेतु प्रस्तावित हाइकु-2009 में सम्मिलित किए जाने हेतु विचारार्थ देश-विदेश के हिन्दी हाइकुकारों से हाइकु रचनाएँ सादर आमन्त्रित हैं। संकलन हेतु निम्न-शर्तें लागू होंगी -


१. हाइकु-1989 व हाइकु-1999 में शामिल रचनाकार इसमें शामिल नहीं होंगे।


२. संकलन में शामिल होने का एक मात्र आधार रचना की गुणवत्ता होगा।


३. प्रत्येक रचनाकार अपने कम से कम 25 प्रतिनिधि हाइकु परिचय व चित्र सहित भेजें।


४. स्वीकृति अथवा अस्वीकृति की सूचना के लिए पता लिखा पोस्टकार्ड या टिकिट लगा लिफाफा भी अवश्य संलग्न करें।


५. रचना भेजने की अन्तिम तिथि 31 दिसम्बर 2008 होगी।


ईमेल से हाइकु भेजने के लिए पता-
jagdishvyom@gmail.com


डाक से भेजने के लिए-
कमलेश भट्ट कमल
सम्पादक
हाइकु-2009
के.एल.-154, कविनगर, गाजियाबाद (उ.प्र.)
मोबा. 09968296694

12 April 2008

हिन्दी का प्रथम कवि

राहुल सांकृत्यायन की हिन्दी काव्यधारा के अनुसार हिन्दी के सबसे पहले मुसलमान कवि अमीर खुसरो नहीं, बल्कि अब्दुर्हमान हुए हैं। ये मुलतान के निवासी और जाति के जुलाहे थे। इनका समय १०१० ई० है। इनकी कविताएँ अपभ्रंश में हैं।
-(संस्कृत के चार अध्याय, रामधारी सिंह दिनकर, पृष्ठ ४३१ )

11 April 2008

नवगीत सुने

फोंट परिवर्तक

23 March 2008

शहीद दिवस पर

भगत सिंह प्रायः यह शेर गुनगुनाते रहते थे-

जबसे सुना है मरने का नाम जिन्दगी है
सर से कफन लपेटे कातिल को ढूँढ़ते हैं।।


मार्च १९३१ को सायंकाल ७ बजकर २३ मिनट पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु फाँसी के फंदे पर झूल गए। श्रीकृष्ण सरल द्वारा लिखी गई कविता उनके ग्रंथ क्रान्ति गंगा से साभार यहाँ दी जा रही है।



आज लग रहा कैसा जी को कैसी आज घुटन है
दिल बैठा सा जाता है, हर साँस आज उन्मन है
बुझे बुझे मन पर ये कैसी बोझिलता भारी है
क्या वीरों की आज कूच करने की तैयारी है ?

हाँ सचमुच ही तैयारी यह, आज कूच की बेला
माँ के तीन लाल जाएँगे, बगत न एक अकेला
मातृभूमि पर अर्पित होंगे, तीन फूल ये पावन,
यह उनका त्योहार सुहावन, यह दिन उन्हें सुहावन।

फाँसी की कोठरी बनी अब इन्हें रंगशाला है
झूम झूम सहगान हो रहा, मन क्या मतवाला है।
भगत गा रहा आज चले हम पहन वसंती चोला
जिसे पहन कर वीर शिवा ने माँ का बंधन खोला।

झन झन झन बज रहीं बेड़ियाँ, ताल दे रहीं स्वर में
झूम रहे सुखदेव राजगुरु भी हैं आज लहर में ।
नाच नाच उठते ऊपर दोनों हाथ उठाकर,
स्वर में ताल मिलाते, पैरों की बेड़ी खनकाकर।

पुनः वही आलाप, रंगें हम आज वसंती चोला
जिसे पहन राणा प्रताप वीरों की वाणी बोला।
वही वसंती चोला हम भी आज खुशी से पहने,
लपटें बन जातीं जिसके हित भारत की माँ बहनें।

उसी रंग में अपने मन को रँग रँग कर हम झूमें,
हम परवाने बलिदानों की अमर शिखाएँ चूमें।
हमें वसंती चोला माँ तू स्वयं आज पहना दे,
तू अपने हाथों से हमको रण के लिए सजा दे।

सचमुच ही आ गया निमंत्रण लो इनको यह रण का,
बलिदानों का पुण्य पर्व यह बन त्योहार मरण का।
जल के तीन पात्र सम्मुख रख, यम का प्रतिनिधि बोला,
स्नान करो, पावन कर लो तुम तीनो अपना चोला।

झूम उठे यह सुनकर तीनो ही अल्हण मर्दाने,
लगे गूँजने और तौव्र हो, उनके मस्त तराने।
लगी लहरने कारागृह में इंक्लाव की धारा,
जिसने भी स्वर सुना वही प्रतिउत्तर में हुंकारा ।

खूब उछाला एक दूसरे पर तीनों ने पानी,
होली का हुड़दंग बन गई उनकी मस्त जवानी।
गले लगाया एक दूसरे को बाँहों में कस कर,
भावों के सब बाँढ़ तोड़ कर भेंटे वीर परस्पर।

मृत्यु मंच की ओर बढ़ चले अब तीनो अलबेले,
प्रश्न जटिल था कौन मृत्यु से सबसे पहले खेले।
बोल उठे सुखदेव, शहादत पहले मेरा हक है,
वय में में ही बड़ा सभी से, नहीं तनिक भी शक है।

तर्क राजगुरु का था, सबसे छोटा हूँ मैं भाई,
छोटों की अभिलषा पहले पूरी होती आई।
एक और भी कारण, यदि पहले फाँसी पाऊँगा,
बिना बिलम्ब किएऌ मैं सीधा स्वर्ग धाम जाऊँगा।

बढ़िया फ्लैट वहाँ आरक्षित कर तैयार मिलूँगा,
आप लोग जब पहुँचेंगे, सैल्यूट वहाँ मारूँगा।
पहले ही मैं ख्याति आप लोगों की फैलाऊँगा,
स्वर्गवासियों से परिचय मैं बढ, चढ़ करवाऊँगा।

तर्क बहुत बढ़िया था उसका, बढ़िया उसकी मस्ती,
अधिकारी थे चकित देक कर बलिदानी की हस्ती।
भगत सिंह के नौकर का था अभिनय खूब निभाया,
स्वर्ग पहुँच कर उसी काम को उसका मन ललचाया।

भगत सिंह ने समझाया यह न्याय नीति कहती है,
जब दो झगड़ें, बात तीसरे की तब बन रहती है।
जो मध्यस्त, बात उसकी ही दोनों पक्ष निभाते,
इसीलिए पहले मैं झूलूं, न्याय नीति के नाते।

यह घोटाला देख चकित थे, न्याय नीति अधिकारी,
होड़ा होड़ी और मौत की, ये कैसे अवतारी।
मौत सिद्ध बन गई, झगड़ते हैं ये जिसको पाने,
कहीं किसी ने देखे हैं क्या इन जैसे दीवाने ?


मौत, नाम सुनते ही जिसका, लोग काँप जाते हैं,
उसको पाने झगड़ रहे ये, कैसे मदमाते हें।
भय इनसे भयभीत, अरे यह कैसी अल्हण मस्ती,
वन्दनीय है सचमुच ही इन दीवानो की हस्ती।

मिला शासनादेश, बताओ अन्तिम अभिलाषाएँ,
उत्तर मिला, मुक्ति कुछ क्षण को हम बंधन से पाएँ।
मुक्ति मिली हथकड़ियों से अब प्रलय वीर हुंकारे,
फूट पड़े उनके कंठों से इन्क्लाब के नारे ।

इन्क्लाब हो अमर हमारा, इन्क्लाब की जय हो,
इस साम्राज्यवाद का भारत की धरती से क्षय हो।
हँसती गाती आजादी का नया सवेरा आए,
विजय केतु अपनी धरती पर अपना ही लहराए।


और इस तरह नारों के स्वर में वे तीनों डूबे,
बने प्रेरणा जग को, उनके बलिदानी मंसूबे।
भारत माँ के तीन सुकोमल फूल हए न्योछावर,
हँसते हँसते झूल गए थे फाँसी के फंदों पर।

हुए मातृवेदी पर अर्पित तीन सूरमा हँस कर,
विदा हो गए तीन वीर, दे यश की अमर धरोहर।
अमर धरोहर यह, हम अपने प्राणों से दुलराएँ,
सिंच रक्त से हम आजादी का उपवन महकाएँ।

जलती रहे सभी के उर में यह बलिदान कहानी,
तेज धार पर रहे सदा अपने पौरुष का पानी।
जिस धरती बेटे हम, सब काम उसी के आएँ,
जीवन देकर हम धरती पर, जन मंगल बरसाएँ।।
= श्रीकृष्ण सरल

शहीद दिवस

आज शहीद दिवस है। आज के दिन शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने हँसते-हँसते भारत की आजादी के लिए 23 मार्च 1931 को 7:23 बजे सायंकाल फाँसी का फंदा चूमा था।
भगत सिंह पर यहाँ पढिए-
http://bhagatsinghmahakavya.blogspot.com

06 February 2008

वचनेश जी की कुछ हास्य रचनाएँ

कवि वचनेश जी हास्य के बहुत चर्चित कवि हैं। प्रस्तुत हैं वचनेश जी के कुछ हास्य छन्द-


पौडर लगाये अंग गालों पर पिंक किये
कठिन परखना है गोरी हैं कि काली हैं।
क्रीम को चुपर चमकाये चेहरे हैं चारु,
कौन जान पाये अधबैसी हैं कि बाली हैं।
बातों में सप्रेम धन्यवाद किन्तु अन्तर का,
क्या पता है शील से भरी हैं या कि खाली हैं।
'वचनेश` इनको बनाना घरवाली यार,
सोच समझ के ये टेढ़ी माँग वाली हैं।
-(परिहास, पृ०-१०) वचनेश


घर सास के आगे लजीली बहू रहे घूँघट काढ़े जो आठौ घड़ी।
लघु बालकों आगे न खोलती आनन वाणी रहे मुख में ही पड़ी।
गति और कहें क्या स्वकन्त के तीर गहे गहे जाती हैं लाज गड़ी।
पर नैन नचाके वही कुँजड़े से बिसाहती केला बजार खडी।।
-(परिहास, पृ०-३०)वचनेश



उपजेगी द्विजाति में रावण से मदनान्ध अघी नर-नारि-रखा।
रिपु होंगे सभी निज भाइयों के धन धान्यहिं छीने के आप-चखा।
यदि पास तलाक हुई तो सुनो हमने 'वचनेश` भविष्य लखा।
फिर होंगी नहीं यहाँ सीता सती मड़रायेंगी देश में सूपनखा।।
-(परिहास, पृ०-२८)वचनेश

12 January 2008

गोरी मधु बोरी सी

आँकी सी बाँकी सी झाँकी सी स्यार की
गोरी मधु बोरी सी, नर्मदा कछार की
शी फूल शीश पर अमुवा के बौर सा
चुनरी का गोटा है दुलहन के मौर सा
चाँदी की झालरियाँ पंख ज्यों मयूर के
कानों के झुमके ज्यों गुच्छे अंगूर के
माथे का स्वेद ज्यों चिरौंजियाँ अचार की ।।

बड़ी बड़ी गोल आँख तरबूजा चीर सी
आँखों की आभा भी रेवा के नीर सी
गालों की लाली भी दाल ज्यों मसूर की
अरहर अषर देह गंष ज्यों कपूर सी
हँसने में खिल खिलती कली जयों अनार की ।।

भरी भरी छाती जयों भरे कनक कलशे हों
आँचल से ढँके भरे दूध या कि जल से हों
पतली सी पुष्ट कमर ककड़ी की देह रे
माखन और गोरस सा अन्तर का स्नेह रे
गोल गोल बाँहें ज्यों शाखें कचनार की ।।

कटि का करधौना ज्यों गढ़ का परकोटा रे
घेरदार लँहगे का भार कर कछौटा रे
पिंडली में लिपट रहे तोड़ों के गीत रे
पैंजन भी बन बैठे एड़ी के मीत रे
बिछुओं की झुनझुन ज्यों रागिनी सितार की ।।

मचल मचल चलती ज्यों सतपुड़िया निर्झरी
बहक बहक चलती ज्यों गंध पवन बावरी
ठिठक ठिठक चलती भिनुसार की तरैया सी
सिहर सिहर चलती अगहन की पुरवैया सी
छलक छलक चलती ज्यों बादरिया क्वाँर की ।।

-बृजमोहन सिंह ठाकुर

20 October 2007

सूरज का टुकड़ा

वक्त के मछुआरे ने
फेंका था जाल
कैद करने के लिए
सघन तम को
जाल के छिद्रों से
फिसल गया तम
और कैद हो गया
सूरज का टुकड़ा ।
वक्त का मछुआरा
कैद किए फिर रहा है
सूरज के उस टुकड़े को
और
सघनतम होती जा रही है
तमराशि घट घट में
उगानी होगी
सूरज के नए टुकड़ों की नई पौध
जगानी होगी बोधगम्यता
युग शिक्षक के अन्तस में
तभी खिलेगी वनराशि
महकेगा वातास
छिटकेंगीं ज्ञान रश्मियाँ ।
क्यों न चल पडें हम
अभी से ! हाँ अभी से !!
इस नए पथ की ओर
कहा भी गया है
जब आँख खुलें
तभी होती है भोर
तभी होती है भोर !!

-डा० जगदीश व्योम