25 June 2017

दे बादल रे ! राहत दे

भूखों को रोटी दे
प्यासों को पानी दे
बादल रे ! राहत दे
यों न परेशानी दे !

आंखों को सपने दे
बिछुड़ों को अपने दे
अकुलाये लोगों को
और मत तड़पने दे
अर्थहीन जीवन को
थोड़े-से मानी दे !

उमस-भरी धरती को
ठंडक दे, छाया दे
तन ढक निर्वस्त्रों के
निर्धन को माया दे
बधिरों को श्रवण-शक्ति
गूंगों को बानी दे !

आंखों को इंद्रधनुष
अधरों को मेघ-राग
पंछी को नीड़ मिले
जन-जन के खुलें भाग
आजीवन याद रहे
एक वह निशानी दे !

यक्षिणियों की गाथा
सुना विकल यक्षों को
थोड़ा-सा उत्सव दे
घायल उपलक्षों को
ठहरे संदर्भों को
तू तनिक रवानी दे !

छंदों, रसबंधों से
कविता की बुझे प्यास
इतना-भर मांग रहा
नव युग का कालिदास
बांच लिया मेघदूत
अब नई कहानी दे !
या शाकुंतल पीड़ा
जानी-पहचानी दे !


-योगेन्द्र दत्त शर्मा

मेघ आये

मेघ आये
सावनी सन्देश लाये
मेह लाये

बज उठे जैसे नगाड़े
शेर जैसे घन दहाड़े
बिजलियों में कड़क जागी
तड़ित की फिर तड़क जागी
यहाँ बरसे वहाँ बरसे
प्राणियों के प्राण सरसे
बादलों के झुंड आये
सलिल कण के कुंड लाये
खूब बरसे खूब छाये
मेघ आये
मेह लाये

गगन का है कौन सानी
बादलों की राजधानी
सुबह बरसे शाम बरसे
झूमकर घनश्याम बरसे
नदी ने तटबन्ध चूमा
झील का मन प्राण झूमा
सेतु बन्धन थरथराया
सृष्टि ने मल्हार गाया
छंद नदियों ने सुनाये
मेघ आये
मेह लाये

मस्त हो मन मोर नाचे
खत धरा का घटा बांचे
जंगलों में मेह बरसा
पर्वतों पर प्रेम सरसा
नेह साँसों में समाया
चतुर्दिक आनन्द छाया
दृष्टि में आमोद भरती
सुआपंखी हुई धरती
इन्द्रधनु जादू दिखाये
मेघ आये
मेह लाये

इधर पानी उधर पानी
हँसे छप्पर और छानी
झील में आई रवानी
आये ऐसे मेघ दानी
खेत जी भर खिलखिलाया
मेढ़ ने दिल फिर मिलाया
हँस रहा है सर्वहारा
स्वप्न आंखों में सजाये
मेघ आये
मेह लाये

-मनोज जैन मधुर

मेघ आये


मेघ आये बड़े बन-ठन के, सँवर के
आगे-आगे नाचती-गाती बयार चली
दरवाजे-खिड़कियाँ खुलने लगी गली-गली
पाहुन ज्यों आये हों गाँव में शहर के

पेड़ झुक झाँकने लगे गरदन उचकाये
आँधी चली, धूल भागी घाघरा उठाये
बांकी चितवन उठा नदी, ठिठकी, घूँघट सरके

बूढ़े़ पीपल ने आगे बढ़ कर जुहार की
‘बरस बाद सुधि लीन्ही’
बोली अकुलाई लता ओट हो किवार की
हरसाया ताल लाया पानी परात भर के

क्षितिज अटारी गदरायी दामिनि दमकी
‘क्षमा करो गाँठ खुल गयी अब भरम की’
बाँध टूटा झर-झर मिलन अश्रु ढरके
मेघ आये बड़े बन-ठन के, सँवर के

-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

10 June 2017

सुखिया की औरत

( दिल्ली के शिक्षा विभाग में उप, शिक्षा निदेशक के पद पर कार्यरत डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर का उराँव लोक साहित्य पर विशेष कार्य है। "उराँव जन-जाति का लोक साहित्य" शीर्षक उनकी पुस्तक चर्चित रही है। डा० कुजूर साधारण जन-जीवन के मध्य से अपनी कविताओं के कथ्य चुनती हैं और उन्हें सीधे-सीधे मुक्त छन्द कविता के रूप में प्रस्तुत करती है। "और फूल खिल उठे" उनकी कविताओं का संग्रह है। प्रस्तुत है उनके इसी संग्रह से "सुखिया की औरत" शीर्षक कविता )


सुखिया की औरत
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सुखिया की औरत
पानी धूप में
टाँड़ खेत से
लाती है
छीलकर
दूब घास।
गिरा नदी में
मार पिछोड़ी
खूब हाथ से
धोती है !
ले बोरी में
रख कर
सिर पर
बगल टोकरी
सब्जी की।
देह अर्द्ध नग्न
एक हाथ में तुम्बा
भरा बासी पानी।
दो मील का रास्ता
चलकर पहुँची बाजार
सुखिया की औरत।
छाई उदासी
घास बोल-बोल कर
बेचा चार आने के
भाव से।
कई बार बेचा है
खरबूज
परवल
करेला
भिन्डी
और मटर
पर
सुखिया की औरत ने
नहीं बेची है
इंसानियत।

-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर


20 May 2017

हे चिर अव्यय ! हे चिर नूतन !


(पृकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत जी के जन्मदिवस पर)

हे चिर अव्यय ! हे चिर नूतन !

कण–कण तृण–तृण में
चिर निवसित
हे ! रजत किरन के अनुयायी
सुकुमार पकृति के उद्घोषक
जीवंत तुम्हारी कवितायी
फूलों के मिस शत वार नमन
स्वीकारो संसृति के सावन
हे चिर अव्यय !
हे चिर नतून !!

बौछारें धारें जब आतीं
लगता है तुम नभ से उतरे
चाँदनी नहीं है पत्तों पर
चहुँ ओर तम्हीं तो हो बिखरे
तारापथ के अनुगामी का
कर रही धरा है मूक नमन
हे चिर अव्यय !
हे चिर नतून !!

सुकुमार वदन’ सुकुमार नयन
कौसानी की सुकुमार धूप
पूरा युग जिसमें संदर्शित
ऐसे कवि के तुम मूर्तरूप
हैं व्योम, पवन अब खड़े, लिये
कर में अभिनन्दन पत्र नमन
हे चिर अव्यय !
हे चिर नतून !!

-डा० जगदीश व्योम

09 April 2017

तलाक

बीबी हुई गोरी मियाँ काले हुए तो तलाक
बीबी अंग्रेजी मियाँ हिन्दी पढ़ें तो तलाक
बीबी फैलसूफ मियाँ उफ करें तो तलाक
बीबी बतलाती मियाँ आगे बढ़े तो तलाक
-वचनेश

06 March 2017

आदिवासी लड़कियों के बारे में

-निर्मला पुतुल

ऊपर से काली
भीतर से अपने चमकते दाँतों
की तरह शान्त धवल होती हैं वे
वे जब हँसती हैं फेनिल दूध-सी
निश्छल हँसी
तब झर-झराकर झरते हैं ....
पहाड़ की कोख में मीठे पानी के सोते
जूड़े में खोंसकर हरी-पीली पत्तियाँ
जब नाचती हैं कतारबद्ध
माँदल की थाप पर
आ जाता तब असमय वसन्त
वे जब खेतों में
फ़सलों को रोपती-काटती हुई
गाती हैं गीत
भूल जाती हैं ज़िन्दगी के दर्द
ऐसा कहा गया है
किसने कहे हैं उनके परिचय में
इतने बड़े-बड़े झूठ ?
किसने ?
निश्चय ही वह हमारी जमात का
खाया-पीया आदमी होगा...
सच्चाई को धुन्ध में लपेटता
एक निर्लज्ज सौदागर
जरूर वह शब्दों से धोखा करता हुआ
कोई कवि होगा
मस्तिष्क से अपाहिज !

-निर्मला पुतुल

11 January 2017

माँ

माँ सुनो,
आँखों में अब परी नहीं आती,
तुम्हारी थपकी नींद से कोसों दूर है,
आज भूख भी कैसी अनमनी सी है
तुम्हारी पुकार की आशा में,
"मुनिया...खाना खा ले"
माँ सुनो,
मैं बड़ी नहीं होना चाहती थी,
तुम्हारी छोटी उंगली से लिपटी
रहना चाहती थी,
छोटी बन कर ।
याद है माँ?
मैं माँ बनना चाहती थी?
'तुम' बनना चाहती थी?
बालों में तौलिया लगा कर?
बड़ी बिंदी में आईने से कितनी बातें की थीं...
सुनो माँ,
एक और बचपन उधार दोगी ?
बड़े जतन से
धो-पोंछ कर रखूँगी,
और जब बड़ी हो जाऊंगी,
बचपन-बचपन खेलूंगी
मैं, तुम बन कर..
माँ, 'तुम' ही तो हूँ न मैं?
तुम नहीं हो तो क्या...

-मानोशी

30 October 2016

तू ने भी क्या निगाह डाली री मंगले,

तू ने भी क्या निगाह डाली
री मंगले,
मावस है स्वर्ण-पंख वाली
करधनियाँ पहन लीं मुँडेरों ने
आले ताबीज पहन आये
खड़े हैं कतार में बरामदे
सोने की कण्ठियाँ सजाये
मिट्टी ने आग उठाकर माथे
बिन्दिया सुहाग की बना ली
री मंगले,
मावस है स्वर्ण-पंख वाली
सरसरा रहीं देहरी-द्वार पर
चकरी-फुलझड़ियों की पायलें
बच्चों ने छतों-छतों दाग दीं
उजले आनन्द की मिसाइलें
तानता बचपन हर तरफ़
नन्ही सी चटचटी दुनाली
री मंगले,
मावस है स्वर्ण-पंख वाली
द्वार-द्वार डाकि़ये गिरा गये
अक्षत-रोली-स्वस्तिक भावना
सारी नाराज़ियाँ शहरबदर,
फोन-फोन खनकी शुभ कामना
उत्तर से दक्छिन सोनल-सोनल
झिलमिल रामेश्वरम्-मनाली
री मंगले
मावस है स्वर्ण-पंख वाली

-रमेश यादव

02 October 2016

है किसकी तस्वीर !

सोचो और बताओ
आखिर है किसकी तस्वीर ?

नंगा बदन, कमर पर धोती
और हाथ में लाठी
बूढ़ी आँखों पर है ऐनक
कसी हुई कद-काठी
लटक रही है बीच कमर पर
घड़ी बँधी जंजीर
सोचो और बताओ
आखिर है किसकी तस्वीर?

उनको चलता हुआ देखकर
आँधी शरमाती थी
उन्हें देखकर, अँग्रेजों की
नानी मर जाती थी
उनकी बात हुआ करती थी
पत्थर खुदी लकीर
सोचो और बताओ
आखिर है किसकी तस्वीर ?

वह आश्रम में बैठ
चलाता था पहरों तक तकली
दीनों और गरीबों का था
वह शुभचिंतक असली
मन का था वह बादशाह,
पर पहुँचा हुआ फकीर
सोचो और बताओ,
आखिर है किसकी तस्वीर?

सत्य अहिंसा के पालन में
पूरी उमर बिताई
सत्याग्रह कर करके
जिसने आजादी दिलवाई
सत्य बोलता रहा जनम भर
ऐसा था वह वीर
सोचो और बताओ,
आखिर है किसकी तस्वीर?

जो अपनी ही प्रिय बकरी का
दूध पिया करता था
लाठी, डंडे, बंदूकों से
जो न कभी डरता था
दो अक्टूबर के दिन
जिसने धारण किया शरीर
सोचो और बताओ,
आखिर है किसकी तस्वीर ?

-डा० जगदीश व्योम