08 January 2012

किसको कौन उबारे


-अवनीश सिंह चौहान

बिना नाव के माझी मिलते
मुझको नदी किनारे
कितनी राह कटेगी चलकर
उनके संग सहारे

इनके-उनके ताने सुनना
दिन-भर देह गलाना
बंधा रुपैया मजदूरी का
नौ की आग बुझाना

अपनी-अपनी ढपली सबकी
सबके अलग शिकारे

बढ़ती जाती रोज उधारी
ले-दे काम चलाना
रोज-रोज झोपड़ पर अपने
नए तगादे आना

अपनी-अपनी घातों में सब
किसको कौन उबारे

पानी-पानी भरा पड़ा है
प्यासा मन क्या बोले
किसकी प्यास मिटी है कितनी
केवल बातें घोले

अपनी आँखों में सपने हैं
उनकी में सुख सारे

22 December 2011

अजूबा रंग-मंच


-उमेश चौहान

बड़ा अजूबा रंग-मंच है,
बदला-बदला सबका वेश
कोई धरे मुखौटा चोखा
देता हर दर्शक को धोखा
कोई लंबे बाल संवारे
कोई है मुंडवाए केश

कोई बोले रटी-रटाई
कोई कहे ज़िगर की खाई
कोई दुमुही जैसा बोले
कोई बोले केवल श्लेष

कोई डुबो-डुबो कर खाए
कोई झूठी आस बंधाए
कोई भर घड़ियाली आँसू
हमदर्दी से आए पेश

कोई दौलत पर इतराए
कोई सत्ता पा बौराए
कोई सब्ज़-बाग दिखलाता
बेंचे लेता सारा देश