17 June 2018

रिटायर पापा

कितने ज्यादा बदल गए हैं,
जब से हुए रिटायर पापा
भीतर-भीतर बिखर गए हैं,
सधे हुए हैं बाहर पापा

कड़कदार आवाज रही जो,
धीमी सी हो गयी अचानक
समझौतों की लाचारी अब,
जीवन का लिख रही कथानक
घर के न्यायाधीश कभी थे,
न्याय माँगते कातर पापा

बेटे-बहुएँ आँख परखते थे
लेकिन अब आँख दिखाते
चले पकड़ कर जो उँगली को,
वह उँगली पर आज नचाते
बच्चों की रफ्तार तेज है,
घिसे हुए से टायर पापा

माँ अब पहले से भी ज्यादा,
 देखरेख पापा की करती
नहीं किसी से कभी डरी माँ,
लेकिन अब बच्चों से डरती
घर में रहकर भी लगते है,
 जैसे हों यायावर पापा

पापा को आनन्दित करतीं,
नाती-पोतों की मुस्काने
मन मयूर भी लगे थिरकने,
 मिल जाते जब मित्र पुराने
कहाँ गया परिवार, प्रेम, वह,
 जिस पर रहे निछावर पापा

कितने ज्यादा बदल गए हैं,
जब से हुए रिटायर पापा
भीतर-भीतर बिखर गए है,
सधे हुए हैं बाहर पापा

-डॉ श्याम मनोहर सिरोठिया 

बाबू जी

घर की बुनियादें दीवारें बामों-दर थे बाबू जी
सबको बाँधे रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी

तीन मुहल्लों में उन जैसी कद काठी का कोई न था
अच्छे ख़ासे ऊँचे पूरे क़द्दावर थे बाबू जी

अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है
अम्मा जी की सारी सजधज सब ज़ेवर थे बाबू जी

भीतर से ख़ालिस जज़बाती और ऊपर से ठेठ पिता
अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी

कभी बड़ा सा हाथ खर्च थे कभी हथेली की सूजन
मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबू जी

-आलोक श्रीवास्तव

25 May 2018

लो एक बजा दोपहर हुई

लो एक बजा दोपहर हुई
चुभ गयी हृदय के बहुत पास
फिर हाथ घडी की तेज सुई

पिघली सडकें, झरती लपटें
झुँझलायीं लूएँ धूलभरी
अम्बर ताँबा, गंधक धरती
बेचैन प्रतीक्षा भूलभरी
किसने देखा, किसने जाना
क्यों मन उमडा, क्यों आँख चुई

रिक्शेवालों की टोली में
पत्ते कटते पुल के नीचे
ले गयी मुझे भी ऊब वहीं
कुछ सिक्के मुट्ठी में भींचे
मैंने भी एक दाँव खेला
इक्का माँगा, पर खुली दुई

सहसा चिंतन को चीर गयी
आँगन में उगी हुई बेरी
बह गयी लहर के साथ लहर
कोई मेरी, कोई तेरी
फिर घर धुनिए की ताँत हुआ
फिर प्राण हुए असमर्थ रुई
लो एक बजा दोपहर हुई


-भारत भूषण

19 May 2018

हर मौसम में छोटेलाल



एक चटाई पर सोता है, हर मौसम में छोटेलाल 
पागल है, सपने बोता है, हर मौसम में छोटेलाल

कैसा है किरदार देह का, कोई नहीं समझ पाया
जो कुछ होना है होता है, हर मौसम में छोटेलाल

दीवारों के कान नहीं होते हैं वरना सुन लेते
क्यों हँसता है क्यों रोता है, हर मौसम में छोटेलाल

जो वारिस हैं वो सेवा के संकल्पों को भूल गये
लावारिस लाशें ढोता है, हर मौसम में छोटेलाल

सरकारी दस्तावेजों में तो आजाद लिखा है वो
लेकिन पिंजरे का तोता है, हर मौसम में छोटेलाल

श्वासों के पनघट पर प्रतिदिन आशाओं के साबुन से
दाग जिन्दगी के धोता है, हर मौसम में छोटेलाल

रमता जोगी बहता पानी, यही कहानी 'अज्ञानी '
कुछ पाता है कुछ खोता है, हर मौसम में छोटेलाल

-डा० अशोक अज्ञानी

07 May 2018

ढूँढ़ते फिरोगे लाखों में

जिस दिन भी बिछड़ गया प्यारे
ढूँढ़ते फिरोगे लाखों में

फिर कौन सामने बैठेगा
बंगाली भावुकता पहने
दूरों-दूरों से लाएगा
केशों को गंधों के गहने
यह देह अजंता शैली-सी
किसके गीतों में सँवरेगी
किसकी रातें महकाएँगीं
जीने के मोड़ों की छुअनें
फिर चाँद उछालेगा पानी
किसकी समुंदरी आँखों में

दो दिन में ही बोझिल होगा
मन का लोहा, तन का सोना
फैली बाँहों-सा दीखेगा
सूनेपन में कोना-कोना
अपनी रुचि-रंगों के चुनाव
किसके कपड़ों में टाँकोगे
अखरेगा किसकी बातों में
पूरी दिनचर्या ठप होना
दरकेगी सरोवरी छाती
धूलिया जेठ-बैसाखों में

ये गुँथे-गुँथे बतियाते पल
कल तक गूँगे हो जाएँगे
होठों से उड़ते भ्रमर-गीत
सूरज ढलते सो जाएँगे
जितना उड़ती है आयु-परी
इकलापन बढ़ता जाता है
सारा जीवन निर्धन करके
ये पारस पल खो जाएँगे
गोरा मुख लिये खड़े रहना
खिड़की की स्याह सलाखों में

-भारत भूषण

08 April 2018

मेरी कुछ आदत ख़राब है

कोई दूरी, मुझसे नहीं सही जाती है
मुँह देखे की मुझसे नहीं कही जाती है
मैं कैसे उनसे, प्रणाम के रिश्ते जोडूँ
जिनकी नाव पराए घाट बही जाती है
मैं तो ख़ूब खुलासा रहने का आदी हूँ
उनकी बात अलग, जिनके मुँह पर नकाब है

है मुझको मालूम, हवाएँ ठीक नहीं हैं
क्योंकि दर्द के लिए दवाएँ ठीक नहीं हैं
लगातार आचरण, ग़लत होते जाते हैं
शायद युग की नयी ऋचाएँ ठीक नहीं हैं
जिसका आमुख ही क्षेपक की पैदाइश हो
वह क़िताब भी क्या कोई अच्छी क़िताब है

वैसे, जो सबके उसूल, मेरे उसूल हैं
लेकिन ऐसे नहीं कि जो बिल्कुल फिजूल हैं
तय है ऐसी हालत में, कुछ घाटे होंगे
लेकिन ऐसे सब घाटे मुझको क़बूल हैं
मैं ऐसे लोगों का साथ न दे पाऊँगा
जिनके खाते अलग, अलग जिनका हिसाब है

-मुकुट बिहारी सरोज

02 April 2018

आप ग़ज़ल कहते हैं

आप ग़ज़ल कहते हैं इसको, पर ये आग हमारी है
इसको हर पल ज़िन्दा रखने की अपनी लाचारी है.

आईना हूँ, अंधापन हरगिज़ मुझको मंज़ूर नहीं
जैसे को तैसा कहने की अपनी ज़िम्मेदारी है.

खुद्दारी थी अपने आगे करते भी तो क्या करते
गुमनामी से लड़कर आखिर हमने उम्र गुज़ारी है .

पहले दुनिया को बाँचेंगे फिर लिखने की सोचेंगे
हम उनसे हैं दूर जिन्हें बस लिखने की बीमारी है .

पत्थर हैं हम तुम दोनों ही , हम पथ में तुम मंदिर में
क्या तक़दीर तुम्हारी भाई क्या तक़दीर हमारी है !

महफ़िल में तुम ही हरदम बैठे हो आगे की सफ़ में
काश! कभी हमसे भी कहते- 'आज तुम्हारी बारी है'.

गिन गिन कर रक्खे हैं इसमें उसके दिन उसकी रातें
मत खोलो इसको ये उसकी यादों की अलमारी है .

-जय चक्रवर्ती

25 December 2017

ओ वासंती पवन हमारे घर आना

ओ वासंती पवन हमारे घर आना

बहुत दिनों के बाद खिड़कियाँ खोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना

जड़े हुए थे ताले सारे कमरों में
धूल भरे थे आले सारे कमरों में
उलझन और तनावों के रेशों वाले
पुरे हुए थे जले सारे कमरों में
बहुत दिनों के बाद साँकलें डोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना

एक थकन-सी थी नव भाव तरंगों में
मौन उदासी थी वाचाल उमंगों में
लेकिन आज समर्पण की भाषा वाले
मोहक-मोहक, प्यारे-प्यारे रंगों में
बहुत दिनों के बाद ख़ुशबुएँ घोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना

पतझर ही पतझर था मन के मधुबन में
गहरा सन्नाटा-सा था अंतर्मन में
लेकिन अब गीतों की स्वच्छ मुंडेरी पर
चिंतन की छत पर, भावों के आँगन में
बहुत दिनों के बाद चिरैया बोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना

-कुँअर बेचैन

22 December 2017

भैया जी

["भैया जी" हर जगह मिल जाते हैं, गाँव में, कस्वों में, नगरों में, महानगरों में...... नित्यगोपाल कटारे जी के इस गीत में भैया जी की जो छवि उभरती है, वह आपके भी कहीं आस-पास की भी हो सकती है.....[ 


                         -शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

तीरथ चारों धाम हमारे भैया जी
कर देते सब काम हमारे भैया जी ।।

भैया जी का रौब यहाँ पर चलता है
हर अधिकारी भैया जी से पलता है
चाँद निकलता है इनकी परमीशन से
इनकी ही मरजी से सूरज ढ़लता है
दिखते बुद्धूराम हमारे भैया जी
कर देते सब काम हमारे भैया जी ।।

पाँचों उँगली घी में और मुँह शक्कर में
कोई न टिकता भैया जी की टक्कर में
लिये मोबाइल बैठ कार में फिरते हैं
सुरा सुन्दरी काले धन के चक्कर में
व्यस्त सुबह से शाम हमारे भैया जी
कर देते सब काम हमारे भैया जी ।।

भैया जी के पास व्यक्तिगत सेना है
दुष्ट जनों को रोजगार भी देना है
चन्दा चौथ वसूली खिला जुआँ सट्टा
प्रजातन्त्र किसको क्या लेना देना है
करते ना आराम हमारे भैया जी
कर देते सब काम हमारे भैया जी ।।

फ़रजी वोट जिधर चाहें डलवा देते
पड़ी ज़रूरत तुरत लट्ठ चलवा देते
भैया जी चाहें तो अच्छे अच्छों की
पूरी इज़्ज़त मिट्टी में मिलवा देते
कर देते बदनाम हमारे भैया जी
कर देते सब काम हमारे भैया जी ।।

बीच काम में जो भी अटकाता रोड़ा
अपने हिस्से में से दे देते थोड़ा
साम दाम से फिर भी नहीं मानता जो
भैया जी ने उसको कभी नहीं छोड़ा
करते काम तमाम हमारे भैया जी
कर देते सब काम हमारे भैया जी ।।

चोरी डाका बलात्कार या हत्या कर
पहुँच जाइये भैया जी की चौखट पर
नहीं कर सकेगा फिर कोई बाल बाँका
भैया जी थाने से ले आयेंगे घर
लेते पूरे दाम हमारे भैया जी
कर देते सब काम हमारे भैया जी ।।

हिन्दू हो मुस्लिम हो या फिर ईसाई
सदा धर्म निरपेक्ष रहें अपने भाई
धन्धे में कुछ भी ना भेद भाव करते
कोई विदेशी हो या कोई सगा भाई
नहीं है नमकहराम हमारे भैया जी
कर देते सब काम हमारे भैया जी ।।

जो भैया जी स्तोत्र सुबह सायं गाते
सड़क भवन पुलियों का ठेका पा जाते
भक्ति भाव से भैया जी रटते-रटते
अन्तकाल में खुद भैया जी बन जाते
इतने शक्तिमान हमारे भैया जी
कर देते सब काम हमारे भैया जी ।।

-शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

15 November 2017

कविता की जरूरत

बहुत कुछ
 दे सकती है कविता
क्यों कि
बहुत कुछ
 हो सकती है कविता
ज़िन्दगी में

अगर हम
जगह दें उसे
जैसे फलों को जगह देते हैं पेड़
जैसे तारों को जगह देती है रात

हम बचाये रख सकते हैं
उसके लिए
अपने अन्दर कहीं
ऐसा एक कोना
जहाँ ज़मीन और आसमान
जहाँ आदमी और भगवान के बीच दूरी
कम से कम हो

वैसे कोई चाहे तो जी सकता है
एक नितान्त कवितारहित ज़िन्दगी
कर सकता है
कवितारहित प्रेम

-कुँवर नारायण