21 April 2014

अपना भी दर्द निराला है

-सोम ठाकुर

अपना भी दर्द निराला है-
कुछ घर का है, कुछ बाहर का
हम देश-देश घूमे, आँखों में लेकर
भार समंदर का

स्वप्नों में अर्द्धकंदराएँ
जागरण लिए खाली बाती
मन में आकाश रामगिरि का,
तन की यात्रा सिंहलद्वीपी
हम बोलेंगे पाषाणों से
है यह अभिशाप जन्म भर का

मिल बैठे आम तले कर ली
शाकुन्तल क्षण की अगवानी
बाहों के घेरे से बढ़कर
होगी क्या और राजधानी
कस्तूरी मन मानता रहा
बन्धन बस ढाई आखर का

हमने महकाये सांसों से
सूने खंडहर वे राजमहल
अंगारों में उगते गुलाब
पहरे के पीछे खिले कमल
हम धनुष तोड़ते फिरे सदा
लेकर हर भरम स्वयंवर का
अपना भी दर्द निराला है
कुछ घर का है, कुछ बाहर का

  -सोम ठाकुर

1 comment:

manjul said...

बहुत ही सुन्दर सुमधुर अनूठा गीत .मंजुल भटनागर