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15 April 2007

ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' की कविताएँ

आत्म-नियंत्रण

तुम मुझसे तब मिली सुनयने
अर्थ मिलन के बदल गये जब !
मैं तब तुम्हें चुराने पहुँचा
सब रखवाले सँभल गये जब !!

करता था जब सूर्य चिरौरी, लेता चन्द्रमा बलाएँ
साँसों में चन्दन, कपूर था, अधरों पर मादक कविताएँ
तब तुम जाने कहाँ बसी थीं, जाने और कहाँ उलझी थीं
दुनिया झुम रही थी जिन पर, तुमने वे देखी न अदाएँ
आँगन ने तब मुझे पुकारा
पाँव द्वार से निकल गये जब !

अब जब बिखर गईं सौगातें, अब जब बहुत बढ़ गई दूरी
जीवन-वन में भटक %u09