tag:blogger.com,1999:blog-119243252008-05-11T18:29:51.713+03:00हिन्दी साहित्यडॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comBlogger59125tag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-4336155018763149522008-05-04T16:52:00.001+03:002008-05-04T16:55:04.512+03:00हाइकु-2009 हेतु रचनाएँ आमंत्रित<p><br />’हाइकु-1989‘ व ’हाइकु-1999‘ नामक चर्चित संकलनों के बाद हाइकु की हिन्दी में प्रथम चर्चा के स्वर्ण जयन्ती वर्ष 2009 में प्रकाशन हेतु प्रस्तावित हाइकु-2009 में सम्मिलित किए जाने हेतु विचारार्थ देश-विदेश के हिन्दी हाइकुकारों से हाइकु रचनाएँ सादर आमन्त्रित हैं। संकलन हेतु निम्न-शर्तें लागू होंगी -</p><p><br />१. हाइकु-1989 व हाइकु-1999 में शामिल रचनाकार इसमें शामिल नहीं होंगे।</p><p><br />२. संकलन में शामिल होने का एक मात्र आधार रचना की गुणवत्ता होगा।</p><p><br />३. प्रत्येक रचनाकार अपने कम से कम 25 प्रतिनिधि हाइकु परिचय व चित्र सहित भेजें।</p><p><br />४. स्वीकृति अथवा अस्वीकृति की सूचना के लिए पता लिखा पोस्टकार्ड या टिकिट लगा लिफाफा भी अवश्य संलग्न करें।</p><p><br />५. यह एक अव्यावसायिक एवं निजी अनुष्ठान है अतः यदि कोई रचनाकार या व्यक्ति इसमें सहयोग करना चाहे तो न्यूनतम 1000 रु0 (एक हजार रुपए) धनादेश द्वारा भेज सकता है। (इस सहयोग को रचना सम्मिलित करने की शर्त न समझा जाए)</p><p><br />६. रचना भेजने की अन्तिम तिथि 30 जून 2008 होगी।</p><p><br />ईमेल से हाइकु भेजने के लिए पता-<br /><a href="mailto:jagdishvyom@gmail.com">jagdishvyom@gmail.com</a></p><p> </p><p> </p><p><br />डाक से भेजने के लिए-<br /><strong>कमलेश भट्ट कमल<br /></strong>सम्पादक<br />हाइकु-2009<br />के.एल.-154, कविनगर, गाजियाबाद (उ.प्र.)<br />मोबा. 09968296694</p>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-90507286713890641722008-04-12T15:07:00.000+03:002008-04-12T15:09:37.299+03:00हिन्दी का प्रथम कविराहुल सांकृत्यायन की हिन्दी काव्यधारा के अनुसार हिन्दी के सबसे पहले मुसलमान कवि अमीर खुसरो नहीं, बल्कि अब्दुर्हमान हुए हैं। ये मुलतान के निवासी और जाति के जुलाहे थे। इनका समय १०१० ई० है। इनकी कविताएँ अपभ्रंश में हैं।<br />-(संस्कृत के चार अध्याय, रामधारी सिंह दिनकर, पृष्ठ ४३१ )डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-79022731566723185682008-04-11T09:19:00.002+03:002008-05-05T11:37:07.761+03:00नवगीत सुने<a href="http://groups.google.com/group/technical-hindi/files">फोंट परिवर्तक </a>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-72423374960782293042008-03-23T17:54:00.002+03:002008-03-23T19:08:28.866+03:00शहीद दिवस पर<span class="">भगत सिंह प्रायः यह शेर गुनगुनाते रहते थे-<br /><br /><span style="color:#cc0000;"><strong><span style="font-size:130%;">जबसे सुना है मरने का नाम जिन्दगी है<br />सर से कफन लपेटे कातिल को ढूँढ़ते हैं।।</span></strong><br /></span><span class=""></span></span><br /><span class=""><span class=""></span><strong><span style="color:#660000;">मार्च १९३१ को सायंकाल ७ बजकर २३ मिनट पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु फाँसी के फंदे पर झूल गए। श्रीकृष्ण सरल द्वारा लिखी गई कविता उनके ग्रंथ क्रान्ति गंगा से साभार यहाँ दी जा रही है।</span></strong></span><strong><span style="color:#660000;"><br /></span><span class=""></span></strong><br /><br /><br />आज लग रहा कैसा जी को कैसी आज घुटन है<br />दिल बैठा सा जाता है, हर साँस आज उन्मन है<br />बुझे बुझे मन पर ये कैसी बोझिलता भारी है<br />क्या वीरों की आज कूच करने की तैयारी है ?<br /><br />हाँ सचमुच ही तैयारी यह, आज कूच की बेला<br />माँ के तीन लाल जाएँगे, बगत न एक अकेला<br />मातृभूमि पर अर्पित होंगे, तीन फूल ये पावन,<br />यह उनका त्योहार सुहावन, यह दिन उन्हें सुहावन।<br /><br />फाँसी की कोठरी बनी अब इन्हें रंगशाला है<br />झूम झूम सहगान हो रहा, मन क्या मतवाला है।<br />भगत गा रहा आज चले हम पहन वसंती चोला<br />जिसे पहन कर वीर शिवा ने माँ का बंधन खोला।<br /><br />झन झन झन बज रहीं बेड़ियाँ, ताल दे रहीं स्वर में<br />झूम रहे सुखदेव राजगुरु भी हैं आज लहर में ।<br />नाच नाच उठते ऊपर दोनों हाथ उठाकर,<br />स्वर में ताल मिलाते, पैरों की बेड़ी खनकाकर।<br /><br />पुनः वही आलाप, रंगें हम आज वसंती चोला<br />जिसे पहन राणा प्रताप वीरों की वाणी बोला।<br />वही वसंती चोला हम भी आज खुशी से पहने,<br />लपटें बन जातीं जिसके हित भारत की माँ बहनें।<br /><br />उसी रंग में अपने मन को रँग रँग कर हम झूमें,<br />हम परवाने बलिदानों की अमर शिखाएँ चूमें।<br />हमें वसंती चोला माँ तू स्वयं आज पहना दे,<br />तू अपने हाथों से हमको रण के लिए सजा दे।<br /><br />सचमुच ही आ गया निमंत्रण लो इनको यह रण का,<br />बलिदानों का पुण्य पर्व यह बन त्योहार मरण का।<br />जल के तीन पात्र सम्मुख रख, यम का प्रतिनिधि बोला,<br />स्नान करो, पावन कर लो तुम तीनो अपना चोला।<br /><br />झूम उठे यह सुनकर तीनो ही अल्हण मर्दाने,<br />लगे गूँजने और तौव्र हो, उनके मस्त तराने।<br />लगी लहरने कारागृह में इंक्लाव की धारा,<br />जिसने भी स्वर सुना वही प्रतिउत्तर में हुंकारा ।<br /><br />खूब उछाला एक दूसरे पर तीनों ने पानी,<br />होली का हुड़दंग बन गई उनकी मस्त जवानी।<br />गले लगाया एक दूसरे को बाँहों में कस कर,<br />भावों के सब बाँढ़ तोड़ कर भेंटे वीर परस्पर।<br /><br />मृत्यु मंच की ओर बढ़ चले अब तीनो अलबेले,<br />प्रश्न जटिल था कौन मृत्यु से सबसे पहले खेले।<br />बोल उठे सुखदेव, शहादत पहले मेरा हक है,<br />वय में में ही बड़ा सभी से, नहीं तनिक भी शक है।<br /><br />तर्क राजगुरु का था, सबसे छोटा हूँ मैं भाई,<br />छोटों की अभिलषा पहले पूरी होती आई।<br />एक और भी कारण, यदि पहले फाँसी पाऊँगा,<br />बिना बिलम्ब किएऌ मैं सीधा स्वर्ग धाम जाऊँगा।<br /><br />बढ़िया फ्लैट वहाँ आरक्षित कर तैयार मिलूँगा,<br />आप लोग जब पहुँचेंगे, सैल्यूट वहाँ मारूँगा।<br />पहले ही मैं ख्याति आप लोगों की फैलाऊँगा,<br />स्वर्गवासियों से परिचय मैं बढ, चढ़ करवाऊँगा।<br /><br />तर्क बहुत बढ़िया था उसका, बढ़िया उसकी मस्ती,<br />अधिकारी थे चकित देक कर बलिदानी की हस्ती।<br />भगत सिंह के नौकर का था अभिनय खूब निभाया,<br />स्वर्ग पहुँच कर उसी काम को उसका मन ललचाया।<br /><br />भगत सिंह ने समझाया यह न्याय नीति कहती है,<br />जब दो झगड़ें, बात तीसरे की तब बन रहती है।<br />जो मध्यस्त, बात उसकी ही दोनों पक्ष निभाते,<br />इसीलिए पहले मैं झूलूं, न्याय नीति के नाते।<br /><br />यह घोटाला देख चकित थे, न्याय नीति अधिकारी,<br />होड़ा होड़ी और मौत की, ये कैसे अवतारी।<br />मौत सिद्ध बन गई, झगड़ते हैं ये जिसको पाने,<br />कहीं किसी ने देखे हैं क्या इन जैसे दीवाने ?<br /><br /><br />मौत, नाम सुनते ही जिसका, लोग काँप जाते हैं,<br />उसको पाने झगड़ रहे ये, कैसे मदमाते हें।<br />भय इनसे भयभीत, अरे यह कैसी अल्हण मस्ती,<br />वन्दनीय है सचमुच ही इन दीवानो की हस्ती।<br /><br />मिला शासनादेश, बताओ अन्तिम अभिलाषाएँ,<br />उत्तर मिला, मुक्ति कुछ क्षण को हम बंधन से पाएँ।<br />मुक्ति मिली हथकड़ियों से अब प्रलय वीर हुंकारे,<br />फूट पड़े उनके कंठों से इन्क्लाब के नारे ।<br /><br />इन्क्लाब हो अमर हमारा, इन्क्लाब की जय हो,<br />इस साम्राज्यवाद का भारत की धरती से क्षय हो।<br />हँसती गाती आजादी का नया सवेरा आए,<br />विजय केतु अपनी धरती पर अपना ही लहराए।<br /><br /><br />और इस तरह नारों के स्वर में वे तीनों डूबे,<br />बने प्रेरणा जग को, उनके बलिदानी मंसूबे।<br />भारत माँ के तीन सुकोमल फूल हए न्योछावर,<br />हँसते हँसते झूल गए थे फाँसी के फंदों पर।<br /><br />हुए मातृवेदी पर अर्पित तीन सूरमा हँस कर,<br />विदा हो गए तीन वीर, दे यश की अमर धरोहर।<br />अमर धरोहर यह, हम अपने प्राणों से दुलराएँ,<br />सिंच रक्त से हम आजादी का उपवन महकाएँ।<br /><br />जलती रहे सभी के उर में यह बलिदान कहानी,<br />तेज धार पर रहे सदा अपने पौरुष का पानी।<br />जिस धरती बेटे हम, सब काम उसी के आएँ,<br />जीवन देकर हम धरती पर, जन मंगल बरसाएँ।।<br />= श्रीकृष्ण सरलडॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-61375738386061566302008-03-23T10:57:00.003+03:002008-03-23T13:29:10.366+03:00शहीद दिवसआज शहीद दिवस है। आज के दिन शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने हँसते-हँसते भारत की आजादी के लिए 23 मार्च 1931 को 7:23 बजे सायंकाल फाँसी का फंदा चूमा था। <br /><a href="http://bhagatsinghmahakavya.blogspot.com">भगत सिंह पर यहाँ पढिए-</a><br /> http://bhagatsinghmahakavya.blogspot.comडॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-6338662337807130842008-02-06T19:59:00.000+03:002008-02-06T20:02:40.949+03:00वचनेश जी की कुछ हास्य रचनाएँकवि वचनेश जी हास्य के बहुत चर्चित कवि हैं। प्रस्तुत हैं वचनेश जी के कुछ हास्य छन्द-<br /><br /><br />पौडर लगाये अंग गालों पर पिंक किये<br />कठिन परखना है गोरी हैं कि काली हैं।<br />क्रीम को चुपर चमकाये चेहरे हैं चारु,<br />कौन जान पाये अधबैसी हैं कि बाली हैं।<br />बातों में सप्रेम धन्यवाद किन्तु अन्तर का,<br />क्या पता है शील से भरी हैं या कि खाली हैं।<br />'वचनेश` इनको बनाना घरवाली यार,<br />सोच समझ के ये टेढ़ी माँग वाली हैं।<br /><span style="color:#990000;">-(परिहास, पृ०-१०) वचनेश<br /></span><br /><br />घर सास के आगे लजीली बहू रहे घूँघट काढ़े जो आठौ घड़ी।<br />लघु बालकों आगे न खोलती आनन वाणी रहे मुख में ही पड़ी।<br />गति और कहें क्या स्वकन्त के तीर गहे गहे जाती हैं लाज गड़ी।<br />पर नैन नचाके वही कुँजड़े से बिसाहती केला बजार खडी।।<br /><span style="color:#990000;">-(परिहास, पृ०-३०)वचनेश<br /></span><br /><br /><br />उपजेगी द्विजाति में रावण से मदनान्ध अघी नर-नारि-रखा।<br />रिपु होंगे सभी निज भाइयों के धन धान्यहिं छीने के आप-चखा।<br />यदि पास तलाक हुई तो सुनो हमने 'वचनेश` भविष्य लखा।<br />फिर होंगी नहीं यहाँ सीता सती मड़रायेंगी देश में सूपनखा।।<br /><span style="color:#990000;">-(परिहास, पृ०-२८)वचनेश</span>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-16447375186614188032008-01-12T20:19:00.000+03:002008-01-14T07:58:40.040+03:00गोरी मधु बोरी सीआँकी सी बाँकी सी झाँकी सी स्यार की<br />गोरी मधु बोरी सी, नर्मदा कछार की<br />शी फूल शीश पर अमुवा के बौर सा<br />चुनरी का गोटा है दुलहन के मौर सा<br />चाँदी की झालरियाँ पंख ज्यों मयूर के<br />कानों के झुमके ज्यों गुच्छे अंगूर के<br />माथे का स्वेद ज्यों चिरौंजियाँ अचार की ।।<br /><br />बड़ी बड़ी गोल आँख तरबूजा चीर सी<br />आँखों की आभा भी रेवा के नीर सी<br />गालों की लाली भी दाल ज्यों मसूर की<br />अरहर अषर देह गंष ज्यों कपूर सी<br />हँसने में खिल खिलती कली जयों अनार की ।।<br /><br />भरी भरी छाती जयों भरे कनक कलशे हों<br />आँचल से ढँके भरे दूध या कि जल से हों<br />पतली सी पुष्ट कमर ककड़ी की देह रे<br />माखन और गोरस सा अन्तर का स्नेह रे<br />गोल गोल बाँहें ज्यों शाखें कचनार की ।।<br /><br />कटि का करधौना ज्यों गढ़ का परकोटा रे<br />घेरदार लँहगे का भार कर कछौटा रे<br />पिंडली में लिपट रहे तोड़ों के गीत रे<br />पैंजन भी बन बैठे एड़ी के मीत रे<br />बिछुओं की झुनझुन ज्यों रागिनी सितार की ।।<br /><br />मचल मचल चलती ज्यों सतपुड़िया निर्झरी<br />बहक बहक चलती ज्यों गंध पवन बावरी<br />ठिठक ठिठक चलती भिनुसार की तरैया सी<br />सिहर सिहर चलती अगहन की पुरवैया सी<br />छलक छलक चलती ज्यों बादरिया क्वाँर की ।।<br /><br /><span style="font-size:130%;"><span style="color:#990000;">-बृजमोहन सिंह ठाकुर</span> </span>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-50440022128950922062007-10-20T16:53:00.000+03:002007-10-20T16:54:41.459+03:00सूरज का टुकड़ावक्त के मछुआरे ने<br />फेंका था जाल<br />कैद करने के लिए<br />सघन तम को<br />जाल के छिद्रों से<br />फिसल गया तम<br />और कैद हो गया<br />सूरज का टुकड़ा ।<br />वक्त का मछुआरा<br />कैद किए फिर रहा है<br />सूरज के उस टुकड़े को<br />और<br />सघनतम होती जा रही है<br />तमराशि घट घट में<br />उगानी होगी<br />सूरज के नए टुकड़ों की नई पौध<br />जगानी होगी बोधगम्यता<br />युग शिक्षक के अन्तस में<br />तभी खिलेगी वनराशि<br />महकेगा वातास<br />छिटकेंगीं ज्ञान रश्मियाँ ।<br />क्यों न चल पडें हम<br />अभी से ! हाँ अभी से !!<br />इस नए पथ की ओर<br />कहा भी गया है<br />जब आँख खुलें<br />तभी होती है भोर<br />तभी होती है भोर !!<br /><br /><span style="color:#990000;">-डा० जगदीश व्योम</span>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-24516056612354602562007-06-25T15:18:00.000+03:002007-10-14T18:42:08.958+03:00रामेश्वर दुबे की कविता<a href="http://bp0.blogger.com/_0_GGr25ReU4/RoDrfSIlqxI/AAAAAAAAAOA/OZ9x5nteHYA/s1600-h/Rameswer+dubey.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5080319302350252818" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 117px; CURSOR: hand; HEIGHT: 137px" height="152" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_0_GGr25ReU4/RoDrfSIlqxI/AAAAAAAAAOA/OZ9x5nteHYA/s320/Rameswer+dubey.jpg" width="152" border="0" /></a><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><span style="font-size:130%;color:#660000;">रामेश्वर दुबे </span><br />सी–57<br />परिवहन अपार्टमेंट<br />सेक्टर 5, वसुन्धरा–201012<br />गाजियाबाद<br /><span style="color:#3333ff;">फोन– 0120– 2884318</span><br /><br /><br />************<br /><br /><br /><span style="color:#003300;"><span style="font-size:180%;">युद्ध </span><br /></span><br />युद्ध हमेशा से था, है, रहेगा<br />युद्ध की विभीषिका थी, है, रहेगी<br />राजा का युद्ध राजा के लिए प्रजा<br />हमेशा लड़ती थी, लड़ती है, लड़ती रहेगी<br />चाहे हो युद्धिष्ठिर, दुर्योधन, कृष्ण, शकुन का राजतंत्र<br />चाहे हो बुश, ब्लेयर, बाजपेयी का प्रजातंत्र<br />राजा का लालच<br />राजा की महत्वाकांक्षा<br />राजा का घमंड<br />राजा का फरेब<br />राजा का झूठ<br />राजा का षड्यन्त्र<br />ये सब चीजें–<br />हमेशा से थीं, हैं, रहेंगी<br />रोग, भ्रष्टाचार, भुखमरी, गरीबी<br />पहले से ही बढ़ी थी, बढ़ती है, बढ़ती रहेगी<br />क्योंकि लड़ाई हमेशा से होती थी,<br />होती है, होती रहेगी<br />पर एक लड़ाई और थी<br />जनता की अपनी<br />जिसे जनता लड़ती रही है<br />आगे भी लड़ेगी<br />सभी शासकों, राजाओं एवं<br />युद्धों के खिलाफ<br />जिसमें<br />जनता जीतेगी<br />या<br />पूरी दुनिया मरेगी !<br /><br /><span style="color:#990000;">—रामेश्वर दुबे </span>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-7118360348107818542007-06-18T19:29:00.000+03:002007-06-22T07:08:43.185+03:00सुरेश श्रीवास्तव"सौरभ" की दो कविताएँ<a href="http://bp3.blogger.com/_0_GGr25ReU4/Rna3hiIlqsI/AAAAAAAAANY/4FgcyALqovY/s1600-h/Saurabh.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_0_GGr25ReU4/Rna3hiIlqsI/AAAAAAAAANY/4FgcyALqovY/s320/Saurabh.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5077447416633207490" /></a><br /><br /><p><span style="font-size:130%;color:#009900;">सुरेश श्रीवास्तव "सौरभ"</span></p><br />जन्म- 13 मार्च 1968<br />शिक्षा- एम. ए. हिन्दी साहित्य<br />सम्प्रति- अभिकर्ता भारतीय जीवन बीमा निगम<br />पत्र पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन तथा आकावाणी और दूरदर्शन से रचनाओं का प्रसारण़ । <br />मंचों पर काव्य पाठ।<br /><br /><br /><br /><br /><p><span style="font-size:130%;color:#339933;">सम्पर्क सूत्र—</span></p><br />सिविल लाइन <br />नई कालोनी, पन्ना (म.प्र.)488001<br />मोबा.9425166562<br /><br />***************<br /><br /><br /><br /><p><span style="font-size:130%;color:#006600;">हवा</span></p><br /><br />जहरीली हवा<br />बहने लगी<br />आदमी बौने हो गए<br />पेड़ मचलना <br />बिसर गए<br />फूल की उदासी देख<br />तितली हैरान है<br />उधर <br />नागफनी जवान है !<br /> —सुरेश श्रीवास्तव "सौरभ"<br /><br /><br /><br /><br /><p><span style="font-size:130%;color:#006600;">छन्द<br /></span></p><br />विश्व बंधुत्व का करो तो आज शंखनाद<br />नाश करो हर भेद–भाव के विसाद को<br />राम का ये देश है औ संस्कार राम के हैं<br />आगे ब़ढ़ गले से लगाइए निषाद को<br />जाति धर्म वर्ग में समाज खण्ड खण्ड हुआ<br />पोस रहे रोज नए वाद को विवाद को<br />भारती की भावना का गान रखने के लिए<br />जड़ से मिटाइये जहाँ से उग्रवाद को !<br /> -सुरेश श्रीवास्तव "सौरभ"डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-9438457098753151982007-06-09T10:17:00.001+03:002008-05-05T11:30:12.360+03:00अभिनन्दन समारोह<a href="http://bp2.blogger.com/_0_GGr25ReU4/RmpUsSIlqaI/AAAAAAAAALQ/BvekQ2OevpA/s1600-h/Picture+041.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5073961049945123234" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 348px; CURSOR: hand; HEIGHT: 209px; TEXT-ALIGN: center" height="237" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_0_GGr25ReU4/RmpUsSIlqaI/AAAAAAAAALQ/BvekQ2OevpA/s400/Picture+041.jpg" width="380" border="0" /></a><br /><a href="http://bp3.blogger.com/_0_GGr25ReU4/RmpUgiIlqZI/AAAAAAAAALI/4_Pwp4903xQ/s1600-h/Picture+039.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5073960848081660306" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" height="220" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_0_GGr25ReU4/RmpUgiIlqZI/AAAAAAAAALI/4_Pwp4903xQ/s400/Picture+039.jpg" width="353" border="0" /></a>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-13150992782223584762007-05-04T14:26:00.000+03:002007-05-04T14:44:59.189+03:00लड़की<a href="http://bp3.blogger.com/_0_GGr25ReU4/RiBr16Wu8GI/AAAAAAAAAGs/yYxyfHRN240/s1600-h/patang.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_0_GGr25ReU4/RiBr16Wu8GI/AAAAAAAAAGs/yYxyfHRN240/s320/patang.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5053157355851542626" /></a><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><strong>शिवसिंह पतंग</strong> आधुनिक हिन्दी कविता के वरिष्ठ कवि हैं। <strong>"चाँदनी के अंधकार में"</strong> तथा <strong>"अपनी आस पर केवल"</strong> आपके प्रकाशित काव्य संग्रह है तथा "<strong>एक थी अतरी" </strong>और <strong>"धागी खम्मा अन्नदाता"</strong> आपके उपन्यास हैं ।<br /><br />यहाँ प्रस्तुत हैं उनकी बहुचर्चित कविता -<br />"लड़की"<br /><br /><br />लड़की के सिर पर है हरी घास का भारा<br />लड़की हरी घास का भारा नहीं है<br />अपनी जरूरतों के लिए हरे घास का भारा<br />बिकने आता है बाजार में<br />लड़की बाजार में नहीं आती<br />खरीददार आता है अपने जानवर के वास्ते<br />पूछता है— पन्द्रह–सोलह पूले तो होंगे<br />तो चलो, सुनकर चल पड़ता है<br />हरे घास का भारा<br />लड़की नहीं चलती<br />तब जानवर के सामने पूले–पूले<br />तिनकों तिनकों में बिखर जाता है<br />हरे घास का भारा<br />लड़की कहीं नहीं दिखती<br />होता नहीं मोल भाव<br />क्योंकि हरे घास का भारा<br />अब हरा नहीं है।<br />****<br /><strong>शिवसिंह पतंग</strong><br />संपर्क-<br /><strong>किला कोतवाली<br />राजगढ़ ब्यावरा म०प्र०</strong><strong></strong><br />Mob- 7372254742डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-12274156121075532662007-04-26T14:57:00.000+03:002007-04-26T15:21:08.834+03:00बी.एल.गौड़ की दो कविताएँ<a href="http://bp3.blogger.com/_0_GGr25ReU4/RjCZKOi5dcI/AAAAAAAAAHE/BNz0XaFVe0U/s1600-h/blg+photo.jpg"><img style="cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_0_GGr25ReU4/RjCZKOi5dcI/AAAAAAAAAHE/BNz0XaFVe0U/s320/blg+photo.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5057710782519276994" /></a><br /><br /><br /><strong>बी.एल.गौड़</strong><br />प्रधान सम्पादक<br />गौडसन्स टाइम्स (मासिक पत्र)<br /><br />सम्पर्क- <strong>आर 8/23 राजनगर <br />गाजियाबाद</strong><br />********<br /><br /><strong>ऐ हिमखण्ड गलो मत ऐसे</strong><br /><br /><br /><br /><a href="http://bp3.blogger.com/_0_GGr25ReU4/RjCXBOi5dbI/AAAAAAAAAG8/TsKKG09uJJI/s1600-h/blg-1.jpg"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_0_GGr25ReU4/RjCXBOi5dbI/AAAAAAAAAG8/TsKKG09uJJI/s320/blg-1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5057708428877198770" /></a><br /><br /><br /><br />ऐ हिमखण्ड गलो मत ऐसे<br />जैसे मेरी उमर गली<br />मैंने तो सब कुछ ही खोया,<br />तुमको फिर भी नदी मिली।<br /><br />मुझ में तुममें अन्तर केवल<br />मैं भी कोमल तुम भी कोमल<br />मैं भी था बस तब तक भावुक<br />जब तक लगे न मन पर चाबुक<br />फिर, अपनों के दंश मिले<br />शत्रु बनकर मित्र मिले<br />तुम पाकर ताप लगे बहने<br />मैं पाकर दर्द लगा लिखने<br />मैं रोया तो क्या पाया?<br />तुम रोये तो राह मिली।<br />ऐ हिमखण्ड गलो मत ऐसे ..........।<br /><br />आओ हम तुम मित्र बनें<br />कुछ पीड़ा मैं तुमको दूँ<br />कुछ सपने मैं तुमसे लूँ<br />फिर दोनों हमराज़ बनें<br />दु:ख, कहने से बँट जाता है<br />सुख, कहने से घट जाता है<br />कितना भी हो कठिन सफ़र<br />बातों में कट जाता है<br />बातों से हटकर देखोगे<br />पाओगे यह उमर ढली।<br />ऐ हिमखण्ड गलो मत ऐसे<br />जैसे मेरी उमर गली<br />मैंने तो सब कुछ ही खोया,<br />तुमको फिर भी नदी मिली।<br /><br /><em><em>-बी.एल.गौड़</em></em><br />****<br /><br /><br />*****<br /><br /><strong>आकुल धुन</strong><br /><br /><br /><a href="http://bp1.blogger.com/_0_GGr25ReU4/RjCWgui5daI/AAAAAAAAAG0/FdfYe2h-Ajk/s1600-h/blg-2.jpg"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_0_GGr25ReU4/RjCWgui5daI/AAAAAAAAAG0/FdfYe2h-Ajk/s320/blg-2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5057707870531450274" /></a><br /><br /><br /><br /><br />जाने कब से पनप रही है ख़ामोशी की आकुल धुन<br />पीड़ा साफ झलकती है यदि मन में लगा हुआ हो घुन ।<br /><br />याद किसी की आती है तो मन की पीर सताती है<br />जब बिछुड़ा कोई मिलता क्यों आँख अश्रु बरसाती है<br />आँगन मेह बरसता है जब मौसम रंग बदलता है<br />दूर कहीं से आती है तब जंगल बीच समाई धुन ।<br />जाने कब से पनप रही है ख़ामोशी की आकुल धुन।।<br /><br /><br />नीलगगन में उड़ते बादल अद्भूत चित्र बनाते हैं<br />द्वार-ओट से झाँक रहे कजरारे नयन बुलाते हैं<br />दो शिखरों के बीच कहीं सूरज के रंग बिखरते हैं<br />परिचित सी आवाज़ बुलाती, ओ ! नाराज़ बटोही सुन।<br />जाने कब से पनप रही है ख़ामोशी की आकुल धुन।।<br /><br /><br />कभी-कभी कोई बेचैनी आकर मुझे बुलाती है<br />छुपकर बैठी याद किसी की चपला-सी चौंकाती है<br />लाख जतन करने पर भी जब रूठी नींद नहीं आती <br />तो आकर थपकी दे जाती किसी गीत की बिसुरी धुन।<br />जाने कब से पनप रही है ख़ामोशी की आकुल धुन।।<br /> <em>-बी.एल.गौड़</em>****डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-68471516813556624512007-04-15T08:45:00.000+03:002007-04-26T14:55:56.729+03:00ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' की कविताएँ<a href="http://www.geocities.com/dr_vyom/omprakashparag"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 220px;" src="http://www.geocities.com/dr_vyom/omprakashparag" border="0" alt="" /></a><br /><br /><br />ओमप्रकाश चतुर्वेदी पराग की कविताएँ -<br /><a href="http://www.kavitakosh.org">कविता कोश पर देखें- </a> <br /><a href="http://www.geocities.com/dr_vyom/parag.htm">अन्यत्र</a><br /><br /><br /><br /><br /><br /><strong>आत्म-नियंत्रण</strong><br />तुम मुझसे तब मिली सुनयने<br />अर्थ मिलन के बदल गये जब !<br />मैं तब तुम्हें चुराने पहुँचा<br />सब रखवाले सँभल गये जब !!<br /><br />करता था जब सूर्य चिरौरी, लेता चन्द्रमा बलाएँ<br />साँसों में चन्दन, कपूर था, अधरों पर मादक कविताएँ<br />तब तुम जाने कहाँ बसी थीं, जाने और कहाँ उलझी थीं<br />दुनिया झुम रही थी जिन पर, तुमने वे देखी न अदाएँ<br />आँगन ने तब मुझे पुकारा<br />पाँव द्वार से निकल गये जब !<br /><br />अब जब बिखर गईं सौगातें, अब जब बहुत बढ़ गई दूरी<br />जीवन-वन में भटक %u09डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-58666011143115166092007-04-11T19:12:00.000+03:002007-05-04T14:40:50.581+03:00शिव सिंह पतंग की कविताएँ<a href="http://bp3.blogger.com/_0_GGr25ReU4/RiBr16Wu8GI/AAAAAAAAAGs/yYxyfHRN240/s1600-h/patang.jpg"><img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_0_GGr25ReU4/RiBr16Wu8GI/AAAAAAAAAGs/yYxyfHRN240/s320/patang.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5053157355851542626" /></a><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br /><br />शिव सिंह पतंग <br /><br /><strong>कस्तूरी और हिरन</strong><br /><br />आग की बात उसने मुझे<br />पानी से लिक्खी<br />लिक्खा कि <br />पानी से अँधेरे पर दस्तक दो तो<br />सब कुछ<br />रोशन रोशन हो जाता है<br />पढ़ते हुए मैंने कहा था<br />जहाँ आधी नदी एक तरफ<br />आधी दूसरी तरफ सिमटी थी<br />जिसके किनारे घास थी<br />हिरन<br />हिरन की नाभि में थी<br />कस्तूरी<br />कस्तूरी और हिरन ....<br />ऐसा क्यों होता है कस्तूरी हिरन<br />कि कौंधती है बिजली बादल में<br />और<br />हरियाली के<br />दरवाजे दरवाजे<br />अंकुराने लगते हैं<br />आम्र मौर<br />मंजरियाँ !<br /><br /><strong>-शिव सिंह पतंग</strong><br /><br />संपर्क-<br /><strong>किला कोतवाली<br />राजगढ़ ब्यावरा म०प्र०</strong><strong></strong>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-49809236576357293772007-03-02T15:58:00.000+03:002007-03-02T16:05:09.673+03:00हाथों में पिचकारियाँबच्चों में किलकारियाँ<br />हाथों में पिचकारियाँ<br />हर मन को बहुत लुभाती है होली !<br /><br />चेहरों पर रंगीलापन<br />हृदय में मिश्री सा मन<br />बिखरों को फिर से मिलाती है होली !<br /><br />मिष्ठानों का सतरंगी रंग<br />गलियों में मस्ती की जंग<br />हवा सी खूबियाँ फैलाती है होली !<br /><br />हर कोई गाता है फाग के गीत<br />कोयल सुनाती नया संगीत<br />बहारों का मौसम लाती है होली !<br /><br />होली खुशियाँ बाँटने का त्योहार<br />लाया संग भगोरिया बाजार<br />दिलों में नया रंग भर जाती है होली !<br /><br />-राजेश पंवार<br />कक्षा ११ विज्ञान<br />जवाहर नवोदय विद्यालय<br />देवास मध्य प्रदेश <br /><br /><strong></strong>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-1167328888314691532006-12-28T20:59:00.000+03:002006-12-28T21:01:28.326+03:00टाँट्या भील : अद्भुत नाट्य प्रस्तुति<div align="justify"><br />सिनेमा और दूरदर्शन ने नाटकों की मंचीय प्रस्तुति को बहुत नुकसान पहुँचाया है, ऐसा माना जाता है। परन्तु नाटक का मंचन यदि मँजे हुए कलाकारों के द्वारा हो और कुशल निर्देशक हो तो आज भी नाटकों का खोया हुआ स्वर्णिम काल फिर वापस आने में समय बहीं लगेगा। स्वतंत्रता संग्राम में टांट्या भील का बहुत बड़ा योगदान रहा है। टांट्या ने गरीब जनता के अधिकार की लड़ाई शुरू की। उसने अंग्रेजों के विरुद्ध आदिवासी जनता को एक मंच पर लाकर क्रांति का शंखनाद किया। वह भीलों तथा जनमानस में आज भी देवता की तरह पूजा जाता है। स्वराज संस्थान संचालनालय, संस्कृति विभाग भोपाल तथा जिला प्रशासन होशंगाबाद एवं वन्या प्रकाशन, भोपाल की ओर से स्थानीय एस० एन० जी० स्कूल के हाल में टांट्या भील पर जनयोद्धा शीर्षक से नाटक का दिनांक २८ १२ २००६ को सायं ७ बजे से मंचन किया गया। इस नाटक का निर्देशन श्री संजय मेहता द्वारा किया गाया। नाटक में जिन कलाकारों ने भाग लिया उन्हें देखकर तो ऐसा लग रहा था मानो टांट्या साक्षात अपने आदिवासी भीलों सहित आ गया हो। संवाद, अभिनय, प्रकाश व्यवस्था सब कुछ ऐसी कि जंगल का वास्तविक दृश्य ही लग रहा था।<br />जिन लोगों ने वर्षों से नाटक नहीं देखा था वे भी इस नाटक को देखकर यह कहते हुए पाये गए कि यदि ऐसे नाटक हर शहर में होने लगें तो लोग सिनेमा छोड़कर फिर नाटकों की ओर आयेंगे।<br />इसी शृंखला में २७ दिसंबर को श्री माधव बारीक द्वारा निर्देशित नाटक अवंतीबाई भी बहुत प्रशंसनीय रहा। २९ दिसंबर को सुश्री प्रीति त्रिपाठी द्वारा निर्देशित नाटक अज़ीजन का मंचन किया जाएगा।<br />टांट्या भील की प्रस्तुति देखकर दर्शक बहुत प्रभावित हुए।<br />इस अवसर पर श्री संतोष व्यास के संचालन में शहीद चन्द्रशेखर आजाद युवा मण्डल होशंगाबाद के प्रदेश अध्यक्ष श्री श्रीकृष्ण यादव द्वारा सभी कलाकारों का माल्यार्पण कर अभिनन्दन किया गया।</div>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-1167020041897589442006-12-25T07:06:00.000+03:002006-12-25T08:28:55.846+03:00हाइकु दिवस समारोह<strong><span style="color:#660000;">हाइकु दिवस समारोह 4 दिसम्बर 2006 </span></strong><br /><br /><a href="http://www.geocities.com/dr_vyom/haikudivas.htm">हाइकु दिवस समारोह 4 दिसम्बर 2006 गाजियाबाद</a><br /><br /><a href="http://www.geocities.com/dr_vyom/haikudivas.htm">हाइकु दिवस समारोह 4 दिसम्बर 2006 रायबरेली</a><br /><br /><a href="http://www.abhivyakti-hindi.org/samachar/samachar67.htm">दैनिक जागरण में रिपोर्ट</a><br /><br /><a href="http://www.abhivyakti-hindi.org/samachar/samachar67.htm">अनुभूति / अभिव्यक्ति पर समाचार</a><br /><br /><a href="http://haiku2006.blogspot.com/2006/12/blog-post.html">हाइकु दर्पण में</a>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-1161523026022135702006-10-22T16:14:00.000+03:002006-10-22T16:19:30.966+03:00हिन्दी चर्चा वाया यू.एस.ए.(भाग- 3)<div align="justify">दुष्यन्त समारोह से वापस आगरा लौटते हुए वहले ही यह तय हो चुका था कि रास्ते में हजरतपुर रुकना है। रामेश्वर काम्बोज हजरतपुर केन्द्रीय विद्यालय में प्राचार्य हैं और हिन्दी साहित्य की तमाम विधाओं से एक साथ जुड़े हुए हैं। लगभग हर पत्र-पत्रिका में उनकी रचनाएँ तो मिलेंगी ही वे इण्टरनेट पर भी खूब सक्रियता के साथ जुड़े हुए हैं। हम लोग बातें कर ही रहे थे कि ड्राइवर ने संकेत किया कि हजरतपुर आ गया है।<br />काम्बोज जी प्रतीक्षा कर रहे थे और साथ में थे हिन्दी मंच के ओजस्वी कवि सन्तोष पाण्डेय। सन्तोष पाण्डेय बहुत अच्छा लिखते हैं और कविताएँ बहुत ही अच्छी तरह प्रस्तुत भी करते हैं। विगत वर्षों में सन्तोष जी अपने दुपहिया वाहन से टकरा गए और उन्हें शारीरिक रूप से काफी परेशान होना पड़ा। लेकिन अब वे स्वस्थ हैं। काम्बोज जी और सन्तोष जी को आमने-सामने रहते देखकर काफी सन्तोष हुआ।<br />काम्बोज जी के यहाँ पहुँचते ही समोसे, मिठाई और चाय का दौर समाप्त हुआ तो कविता सुनने-सुनाने की सुगबुगाहट शुरू हो गई। सोम ठाकुर बैठे हों और उन्हें बिना कविता सुनाये छोड़ दिया जाये, यह भी भला कभी संभव है। सोम जी ने हर अवसर के लिए कविताएँ लिखी हैं जिनमें उनकी कुछ कविताएँ तो अति लोकप्रिय और कालजयी हैं। विशेष रूप से जिन कविताओं में लोकतत्व समाहित हो जाता है उन कविताओं का माधुर्य स्वत: ही बढ़ जाता है और फिर जब लोकगीत सोमठाकुर के कण्ठ से फूटे तो फिर बात ही क्या है।<br />भारतीय नारी अपने पति की उपस्थिति सर्वत्र पाती है। उसे पूरी सृष्टि में अपने पति की ही भीनी-भीनी गंध महसूस होती है, चाहे उसका श्रृंगार हो या घर-द्वार सब जगह उसके प्यारे पिया ही तो महक रहे हैं। इसी भाव-भूमि का लोकगीत सोमठाकुर ने सुनाया तो सारी थकान दूर हो गई और ऐसी सुगंध महकी कि मुझे तो अब भी महसूस हो रही है..... शायद आपको भी इस लेख में से महसूस हो सके तो जरूर बताइयेगा-<br /><span style="color:#660000;">बेला न महके<br />चमेली न महके<br />मेरे गजरे में मेरे पिया महकें।<br /></span>(पूरा गीत फिर कभी ........)<br />सभी की कविताओं का एक-एक दौर चला और फिर हम लोग आगरा के लिए चल दिए। सोम ठाकुर को उनके आवास पर छोड़कर कटारे जी, कमलेश जी के साथ अशोक रावत के आवास पर आ गए।<br />पूरे दिन कुछ न कुछ खाते ही रहे इस लिए भूख तो गायब ही थी पर रावत जी के घर का स्वादिष्ट भोजन आकर्षित कर रहा था इसलिए थोड़ा थोड़ा खा कर फिर कमलेश भट्ट कमल और अशोक रावत की नई गजलें सुनी। अशोक रावत का एक शेर तो अब तक मन पर छाया हुआ है-<br />थोड़ी मस्ती थोड़ा सा ईमान बचा पाया हूँ<br />इतना क्या कम है अपनी पहचान बचा पाया हूँ।। (अशोक रावत)<br />रात काफी हो गई थी..... हम लोग सो गये क्योंकि सुबह जल्दी उठकर गुड़गाँव के लिए प्रस्थान करना था।</div><div align="justify"><br />................ (क्रमश: .......) ......... </div>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-1161426704131390382006-10-21T13:28:00.000+03:002007-06-16T09:17:25.449+03:00दीवाली पर दो हाइकु और एक नवगीत<div align="center"><br /><span style="color:#cc0000;">दीवाली पर दो हाइकु और एक नवगीत के साथ सभी को दीपावली की शुभकामनाएँ !!<br /></span><br /><span style="color:#003333;">घट जाएगा<br />तम का ये पसारा<br />दीप हुंकारा।<br />*****<br />सदा से बैर<br />अंधकार का सिर<br />दिए के पैर।<br />०००</span></div><div align="center"><span style="color:#003333;"></span> </div><div align="center"><span style="color:#003333;">*********************************</span></div><div align="center"><span style="color:#003333;"></span> </div><div align="left"><span style="color:#003333;"><strong><span style="color:#990000;">नवगीत</span></strong> </span></div><br />बाँध रोशनी की गठरी<br />फिर आई दीवाली।।<br /><br />पूरी रात चले हम<br />लेकिन मंज़िल नहीं मिली<br />लौट-फेर आ गए वहीं<br />पगडंडी थी नकली<br />सफर गाँव का और<br />अंधेरे की चादर काली।<br />बाँध रोशनी की गठरी<br />फिर आई दीवाली।।<br /><br />ताल ठोंक कर तम के दानव<br />कितने खड़े हुए<br />नन्हें दीप जुटाकर साहस<br />कब से अड़े हुए<br />हवा, समय का फेर समझकर<br />बजा रही ताली।<br />बाँध रोशनी की गठरी<br />फिर आई दीवाली।।<br /><br />लक्ष्य हेतु जो चला कारवाँ<br />कितने भेद हुए<br />रामराज की बातें सुन-सुन<br />बाल सफेद हुए<br />ज्वार ज्योति का उठे<br />प्रतीक्षा दिग-दिगन्त वाली।<br />बाँध रोशनी की गठरी<br />फिर आई दीवाली।।<br /><br />लड़ते-लड़ते दीप अगर<br />तम से, थक जाएगा<br />जुगुनू है तैयार, अँधेरे से<br />भिड़ जाएगा<br />विहँसा व्योम देख दीपक की<br />अद्भुत रखवाली।<br />बाँध रोशनी की गठरी<br />फिर आई दीवाली।।<br /><br />-<span style="color:#660000;">डॉ० जगदीश व्योम</span>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-1160900079389178472006-10-15T11:08:00.000+03:002006-10-15T15:10:13.960+03:00हिन्दी चर्चा वाया यू.एस.ए. (भाग - 2)<div align="justify">.अब शुरू हुआ साहित्यिक यात्रा का दौर। होशंगाबाद के शास्त्री नित्यगोपाल कटारे जी से मैंने साहित्यिक यात्रा के सहभागी बनने हेतु अनुरोध किया और वे अपने सभी महत्वपूर्ण कार्य छोड़-छाड़ कर चलने को तैयार हो गए। 15 सितम्बर को गोंडवाना एक्सप्रेस से आरक्षण करावाया और चल दिए गंतव्य स्थान की ओर। अनेक मित्रों ने हमें वधाई दी मानो हम किसी बहुत बड़े अभियान पर जा रहे हों। भाई महेश मूलचंदानी तो रेलवे स्टेशन पर तब तक हमारे साथ रहे जब तक रेलगाड़ी चल नहीं दी। 16 सित. को प्रात: 6 बजे हम आगरा पहुँचे और वहाँ आटो रिक्शा लेकर मानस नगर स्थित सुप्रसिद्ध गजलकार अशोक रावत के आवास पर पहुँचे। कमलेश भट्ट कमल रात को ही गाजियाबाद से वहाँ आ गए थे। स्नानादि के बाद चाय नाश्ता किया और शिकोहाबाद के लिए चलने को तैयार हुए। आगरा से शिकोहाबाद जाने के लिए क्वालिस गाड़ी तैयार थी जिसकी व्यवस्था उ. प्रदेश हिन्दी संस्थान की ओर से की गई थी। हम लोग गाड़ी में बैठकर हिन्दी संस्थान के कार्यकारी उपाध्यक्ष और सुप्रसिद्ध कवि सोम ठाकुर को लेने उनके अहीर पाड़ा स्थित आवास पर पहुँचे। सब लोग अब शिकोहाबाद की ओर चल दिए साथ में थे- सोम ठाकुर, कमलेश भट्ट कमल, अशोक रावत, प्रताप दीक्षित, डॉ० जगदीश व्योम, शास्त्री नित्यगोपाल कटारे, संजीव गौतम, ओमप्रकाश नदीम, नदीम। पूरे रास्ते साहित्यिक चर्चाएँ होती रहीं। विशेष रूप से सोम ठाकुर जी ने अनेक संस्मरण सुनाए। सोम जी खूब खुलकर बातें करते हैं और संस्मरण इतने रोचक तरीके से सुनाते हैं कि लगता है सुनते ही रहें। सोम ठाकुर के साथ यात्रा करने का अपना अलग ही अनुभव है। लगभग तीन घंटे में हम लोग शिकोहाबाद पहुँच गए रास्ता कब पूरा हो गया, पता ही नहीं चला। शिकोहाबाद पहुँचकर ज्ञानदीप विद्यालय की प्राचार्या डॉ० रजनी यादव कुंकुम और फूल मालाएँ लेकर हम लोगों की प्रतीक्षा कर रही थीं। सुप्रसिद्ध कवि और सांसद उदय प्रताप सिंह जी को भी समारोह में आना था परन्तु वे किसी कारणवश नहीं पहुँच पाये। मैंने महसूस किया कि वहाँ उदयप्रताप सिंह जी की कमी महसूस की जा रही थी।<br />हिन्दी गजल के शीर्षस्थ कवि दुष्यन्त कुमार पर समारोह केन्द्रित था। कार्यक्रम में हम लोगों के अतिरिक्त विनोद सोनकिया, नासिर अली, जमुनाप्रसाद उपाध्याय, भावना तिवारी वहाँ पहले से उपस्थित थे। कमलेश भट्ट कमल समारोह के मुख्य वक्ता थे। संयोजक थे अशोक रावत। कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। संचालक अशोक रावत ने दुष्यन्त कुमार का विस्तार से परिचय देते हुए उनकी गजलों पर भी प्रकाश डाला। सरस्वती वंदना शास्त्री नित्यगोपाल कटारे ने की और वक्ताओं ने दुष्यन्त कुमार जी की गजलों से उद्धरण देते हुए अपनी अपनी बात कही।<br />कटारे जी के संस्कृत लोकगीत खूब चर्चा में रहे। कमलेश भट्ट कमल की गजलें और सोम ठाकुर के गीतों की मांग होती रही पर समय कम पड़ गया। दुष्यन्त कुमार पर मेरे द्वारा बनाये गए ब्लाग की भी खूब चर्चा रही अनेक लोगों ने उसका पता लिखा और देखने के लिए उत्सुक दिखे। कमी यह महसूस हो रही थी कि यदि एक कम्प्यूटर और इंटरनेट की व्यवस्था होती तो हिन्दी में हो रहे तमाम महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्यों को आसानी से दिखाया जा सकता था। मंच पर बहुत ही सुन्दर कविताएँ सुनने को मिलीं। नई कवयित्री भावना तिवारी ने मधुर कंठ से एक प्रणयगीत पढ़ा ...... शेष कविताओं की चर्चा फिर किसी समय करूँगा। हम लोग वापस लौट चले आगरा के लिए।<br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/7060/986/1600/dushyant15sept.2.jpg"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/7060/986/400/dushyant15sept.2.jpg" border="0" /></a><br /><span style="color:#3333ff;">[मंच पर बैठे हुए सर्व श्री डॉ॰ जगदीश व्योम, संजीव गौतम, प्रताप दीक्षित, विनोद सोनकिया, ओमप्रकाश नदीम, नासिर अली नदीम, सोम ठाकुर, कमलेशभट्ट कमल, भावना तिवारी, शास्त्री नित्यगोपाल कटारे, जमुनाप्रसाद उपाध्याय, अशोक रावत]<br /></span><br />गाड़ी में बैठते ही फिर चर्चा शुरू हो गई ..... कभी पुरस्कारों को लेकर तो कभी कविता के गिरते हुए स्तर को लेकर कभी मंचों पर चुटुकलों और फूहड़पन से श्रोताओं का स्वाद खराब करने की बात सभी ने स्वीकारी। इण्टरनेट पर हिन्दी साहित्य के विषय में लम्बी चर्चा हुई और यह विचार भी किया गया कि कैसे ंअच्छा साहित्य नेट पर दिया जाए। प्रदेशों की हिन्दी समितियाँ, अकादमी, संस्थान, हिन्दी संस्थाएँ यदि अपने बड़े कवि सम्मेलनों (जिनमें तमाम फूहड़ कवियों को भी लोग झेलते हैं) के बजट में से मात्र 10 प्रतिशत भी खर्च कर दें तो इण्टरनेट पर हिन्दी का अच्छा खासा भण्डार स्थापित किया जा सकता है। जिससे हिन्दी भाषा और साहित्य अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी गरिमा के साथ पहचान बना सकता है। विकीपीडिया से लेकर कविताकोश पर हिन्दी की स्थिति की चर्चा भी हुई। मैंने यह महसूस किया कि हिन्दी के बड़े से बड़े साहित्यकार और कवि इण्टरनेट पर हिन्दी की स्थिति के विषय में अधिक जानकारी अभी भी नहीं रखते हैं। लेकिन सभी का रुचि इस ओर है। और चाहते हैं कि उनकी रचनाएँ भी इण्टरनेट पर आयें।<br />बातों बातों में हजरतपुर आ गया और गाड़ी केन्द्रीय विद्यालय हजरतपुर की ओर मुड़ गई। रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु` के आवास पर चाय और समोसे हम लोगों की प्रतीक्षा कर रहे थे।<br />......(क्रमश: ....)</div>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-1160220407177170032006-10-07T14:23:00.000+03:002006-10-07T15:09:47.366+03:00हिन्दी चर्चा वाया यू.एस.ए.(भाग-1)<div align="justify"><br />साहित्यिक यात्राओं का अपना अलग आनन्द है। इन यात्राओं में साहित्य पर चर्चा करने के इतने अवसर रहते हैं कि चर्चा कभी खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। जिन विषयों पर कभी सोचा भी न गया हो वह भी चर्चा के केन्द्र में अचानक आ जाते हैं और फिर कभी-कभी कोई महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लग जाता है जिस पर चर्चा शुरू हो जाती है। हिन्दी साहित्य के अनेक महत्वपूर्ण कार्यक्रमों का ताना-बाना इन्हीं यात्रिक चर्चाओं की ही देन है। जिनमें हिन्दी कहानी पर केन्द्रित संगमन एक उदाहरण है।<br />इस बार की साहित्यिक यात्रा का सूत्र प्रवासी भारतीयों के मध्य से था। हिन्दी साहित्य को प्रवासी भारतीयों का योगदान लम्बे समय से मिलता रहा है। परन्तु कहाँ-कहाँ क्या कार्य हो रहा है, इसकी भरपूर जानकारी सभी हिन्दी प्रेमियों को नहीं मिल पाती है। अब हिन्दी वालों के भी इण्टरनेट का जिन्न हाथ लग गया है जो दुनिया भर में हिन्दी में क्या और कहाँ कार्य हो रहा है, सब कुछ पलक झपकाते लाकर सामने रख देता है। अब इण्टरनेट पर हिन्दी की भी तूती बोलने लगी है और बोलने ही नहीं बल्कि साधिकार बोलने लगी है जिसकी अनुगूँज दुनियाभर के हिन्दी प्रेमी सुन रहे हैं।<br />(<a href="http://www.anubhuti-hindi.org">अनुभूति</a>, <a href="http://launch.groups.yahoo.com/group/ekavita/">ई कविता समूह</a>) अब हिन्दी प्रेमी आपस में मिलकर विचारों का आदान-प्रदान भी करने लगे हैं।<br />भारतवर्ष में उत्तर प्रदेश राज्य का हिन्दी संस्थान, हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं संवर्द्धन में पूरी लगन से अपना कर्तव्य निभा रहा है। प्रतिवर्ष १४ सितम्बर हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी सेवियों को लाखों रुपए के पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया जाता हे। इस वर्ष के पुरस्कारों की घोषण हुई तो उनमें से एक नाम इण्टरनेट से जुड़ी हुई प्रतिभा का नाम देखकर हिन्दी संस्थान की चयन प्रक्रिया को मन ही मन प्रणाम किया। यू.एस.ए. में लगभग दो दशक से रह रहे श्री अनूप भार्गव ने हिन्दी को इण्टरनेट पर लाने में तथा हिन्दी प्रेमियों व साहित्यकारों को आपस में चर्चा करने और विचार विमर्श करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है। आपस में साहित्यिक चर्चा करने के लिए याहू पर ई कविता समूह बनाया जिस पर प्रतिदिन हिन्दी प्रेमी आपस में हिन्दी साहित्य की चर्चा करते हैं। कहाँ, क्या छप रहा है? कौन सी कविता किस कवि की है? कौन सी पत्रिका कहाँ से प्रकाशित हो रही है? हिन्दी साहित्य में क्या अच्छा है ? आदि की चर्चा यहाँ देखी जा सकती है जो निरन्तर चलती रहती है। कोई भी कवि जो इस समूह का सदस्य है, अपनी कविता यहाँ प्रकाशित कर सकता है जिसे हजारों प्रवासी भारतीय और भारतीय हिन्दी प्रेमी पढ़ सकते हैं। अनूप जी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के सक्रिय सचिव हैं जो कि अमेरिका में अनेकानेक साहित्यिक कार्यक्रमों के लिए सुविख्यात है। अनूप जी की एक विशेषता और है वह यह कि वे अत्यन्त सहज, व्यावहारिक, सहयोग करने के लिए सदैव तत्पर तथा इण्टरनेट के विशेषज्ञ हिन्दी विद्वान हैं। यही कारण है कि इस वष जब अनूप जी को हिन्दी संस्थान का पुरस्कार मिला तो इण्टरनेट में चर्चाओं की झड़ी लग गई।<br />अनूप जी ने मुझे सूचना दी कि वे पुरस्कार लेने के लिए भारत आ रहे हैं और अपना कायक्रम भी सुनिश्चित करके बताया तो मुझे लगा कि यह अच्छा अवसर है एक संगोष्ठी के लिए। स्थान और तिथि तय किए गए। १६ सितम्बर को गुड़गाँव में कार्यक्रम तय हुआ। डॉ० कुवँर बेचैन, उदयप्रताप सिह व कमलेश भट्ट कमल से बात हुई। इसी बीच उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का एक कार्यक्रम दुष्यन्त कुमार जी की स्मृति में शिकोहाबाद में १६ सितम्बर को सुनिश्चित हो गया। मैं उस समय दिल्ली में था तो कमलेश जी ने इसकी जानकारी मुझे भी दी और आग्रह किया कि गुड़गाँव में १६ सित० के स्थान पर १७ सितम्बर को कार्यक्रम रखा जाए तथा १६ सित० को शिकोहाबाद के दुष्यन्त समारोह में सहाभागिता के लिए मुझे भी आमंत्रित किया। मैं बड़ी दुविधा में था, अनूप जी को एक ई मेल लिखा और वे सहर्ष तैयार हो गए।<br />(क्रमश:)</div>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-1159852737387154272006-10-03T08:15:00.000+03:002006-10-03T08:18:57.396+03:00अहिंसा के बिरवेचलो फिर अहिंसा के बिरवे उगाएँ।<br />बहुत लहलही आज हिंसा की फसलें<br />प्रदूषित हुई हैं धरा की हवाएँ।<br />चलो फिर अहिंसा के बिरवे उगाएँ।।<br /><br />बहुत वक़्त बीता कि जब इस चमन में<br />अहिंसा के बिरवे उगाए गए थे<br />थे सोये हुए भाव जन-मन में गहरे<br />पवन सत्य द्वारा जगाये गये थे<br /><br />बने वृक्ष, वट-वृक्ष, छाया घनेरी<br />धरा जिसको महसूसती आज तक है<br />उठीं वक़्त की आँधियाँ कुछ विषैली<br />नियति जिसको महसूसती आज तक है<br /><br />नहीं रख सके हम सुरक्षित धरोहर<br />अभी वक़्त है, हम अभी चेत जाएँ।<br />चलो फिर अहिंसा के बिरवे उगाएँ।।<br /><br /><br /><br />नहीं काम हिंसा से चलता है भाई<br />सदा अंत इसका रहा दु:खदाई<br />महावीर, गाँधी ने अनुभव किया, फिर<br />अहिंसा की सीधी डगर थी बताई<br /><br />रहे शुद्ध-मन, शुद्ध-तन, शुद्ध-चिंतन<br />अहिंसा के पथ की यही है कसौटी<br />दुखद अन्त हिंसा का होता हमेशा<br />सुखद बहुत होती अहिंसा की रोटी<br /><br />नई इस सदी में, सघन त्रासदी में<br />नई रोशनी के दिये फिर जलाएँ!<br />चलो फिर अहिंसा के बिरवे उगाएँ !!<br />***<br /><div align="center"><br /><span style="color:#990000;">-डॉ० जगदीश `व्योम'</span></div>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-1159276516077963742006-09-26T16:11:00.000+03:002006-09-26T16:22:43.283+03:00अनूप भार्गव के बहाने हिन्दी चर्चा* भारत वर्ष में हिन्दी चर्चा वाया यू.एस.ए. - डॉ॰ जगदीश व्योम (आलेख जल्दी ही)<br /><br />* <a href="http://launch.groups.yahoo.com/group/ekavita/message/8004">रेनू आहूजा की प्रस्तुति गुड़गाँव की हिन्दी संगोष्ठी</a>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-11924325.post-1155717691567754212006-08-16T11:30:00.000+03:002006-08-16T11:41:31.576+03:00१५ अगस्त<span style="color:#006600;">गीत<br /></span>हमारे घर की दीवारों में अनगिनत दरारें हैं<br />सुनिश्चित है, कहीं बुनियाद में गलती हुई होगी।<br /><br />हमारे पास सब कुछ है मगर दुर्भाग्य से हारे<br />कहीं अन्दर से चिनगारी कहीं बाहर से अंगारे<br />गगन से बिजलियाँ कड़कीं धरा से जलजले आए<br />यही क्या कम है हम इतिहास में जीवित चले आए<br /><br />हमारे अधबने इस नीड़ का नक्शा बताता है<br />कि कुछ आरम्भ में कुछ बाद में गलती हुई होगी।<br /><br /><br />ये वह धरती है जिसमें प्यार की गंगा उतरती है<br />मनुज में और मनुज में जो नहीं कुछ भेद करती है<br />हमारे पूर्वर्जों ने प्यार की बोली सदा बोली<br />अभागे पुत्र उनके खेलते हैं खून की होली<br /><br />कुराने पाक, गीता, ग्रंथ साहब शीश धुनते हैं<br />कि उनके मूल के अनुवाद में गलती हुई होगी।<br /><br /><br />अगर ईमान की पूछो तो हर ईमान का गम है<br />कि उन्हें हर मानने वाला उन्हें कुछ जानता कम है<br />जो हिंसा के समर्थक हैं सबक इतिहास से ले लें<br />कभी फल फूल देती ही नहीं अन्याय की बेलें<br /><br />हजारों वर्ष भारत ने महाभारत के दु:ख झेले<br />दुशासन से क्षणिक उन्माद में गलती हुई होगी।<br /><br /><br />जो काया हो गई पीड़ित तो लालच में फँसी होगी<br />अहिंसा के पुजारी के ही चेहरे पर हँसी होगी<br />मज़हब की आग में आँधी सियासत की चलाते हैं<br />यही नादान हँसती खेलती बस्ती जलाते हैं<br /><br />जो सब कुछ जल गया फिर होश में आए तो क्या आए<br />हवा और आग के संवाद में गलती हुई होगी।<br /><br /> <span style="color:#990000;">-उदय प्रताप सिंह<br /></span>(आजकल, जुलाई-१९९२ से साभार)<br /><br />***********<br /><br /><br /><span style="color:#990000;"><strong>सुदामा पाण्डेय धूमिल की दो कविताएँ</strong></span><br /><br /> ( आजादी के बाद कवि धूमिल की पीड़ा )<br /><br />-१-<br />अपने यहाँ संसद<br />तेली की वह घानी है<br />जिसमें आधा तेल है<br />और आधा पानी है<br />और यदि यह सच नहीं है<br />तो वहाँ एक ईमानदार आदमी को<br />अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों है ?<br />जिसने सत्य कह दिया है<br />उसका बुरा हाल क्यों है ?<br /><br /><span style="color:#990000;">-सुदामा पाण्डेय धूमिल</span><br /><span style="color:#990000;"><br /></span>-२-<br />बीस साल बाद<br />सुनसान गलियों से<br />चोरों की तरह गुजरते हुए<br />अपने आप से सबाल करता हूँ<br />क्या आज़ादी तीन थके हुए रंगों का नाम है?<br />जिन्हें एक पहिया ढोता है<br />या इसका कोई खास मतलब होता है ?<br /></span><br /><span style="color:#990000;">-सुदामा पाण्डेय धूमिल</span><br /><span style="color:#333333;">******* </span>डॉ॰ व्योमhttp://www.blogger.com/profile/10667912738409199754noreply@blogger.com