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13 July 2017

सूरज का ब्याह

उड़ी एक अफवाह, सूर्य की शादी होने वाली है
वर के विमल मौर में मोती उषा पिराने वाली है
मोर करेंगे नाच, गीत कोयल सुहाग के गाएगी
लता विटप मंडप-वितान से वंदन वार सजाएगी
जीव-जन्तु भर गए खुशी से, वन की पाँत-पाँत डोली
इतने में जल के भीतर से एक वृद्ध मछली बोली-
‘‘सावधान जलचरो, खुशी में सबके साथ नहीं फूलो
ब्याह सूर्य का ठीक, मगर, तुम इतनी बात नहीं भूलो
एक सूर्य के ही मारे हम विपद कौन कम सहते हैं
गर्मी भर सारे जलवासी छटपट करते रहते हैं
अगर सूर्य ने ब्याह किया, दस-पाँच पुत्र जन्माएगा
सोचो, तब उतने सूर्यों का ताप कौन सह पाएगा ?
अच्छा है, सूरज क्वाँरा है, वंश विहीन, अकेला है
इस प्रचंड का ब्याह जगत की खातिर बड़ा झमेला है।’’

-रामधारी सिंह दिनकर 

24 October 2015

परम्परा

परम्परा को
अंधी लाठी से मत पीटो
जो जीवित है
जैसी भी हो
ध्वंस से
बचा रखने लायक है।
पानी का छिछला होकर
समतल में दौड़ना
यह क्रांति का नाम है
लेकिन घाट बाँध कर
पानी को गहरा बनाना
यह परम्परा का काम है।
परम्परा और क्रान्ति में
संघर्ष चलने दो
आग लगी है तो
सूखी टहनियों को जलने दो।
परम्परा जब लुप्त होती है
लोगों को नींद नहीं आती
न नशा किए बिना
चैन या कल पड़ती है
परम्परा जब लुप्त होती है
सभ्यता अकेलेपन के
दर्द से मरती है।

-रामधारी सिंह दिनकर

05 June 2012

प्रथम काव्य है वृक्ष


विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की यह कविता

     -- 1--
पहली पंक्ति लिखी विधि ने,
जिस दिन कविता की
उस दिन पहला वृक्ष
स्वयं उत्पन्न हो गया
प्रथम काव्य है वृक्ष
विश्व के पहले कवि का ।

      -- 2 --
द्रुमो को प्यार करता हूँ
प्रकृति के पुत्र ये
माँ पर सभी कुछ
छोड़ देते हैं
न अपनी ओर से
कुछ भी कभी कहते
प्रकृति जिस भाँति
रखना चाहती
उस भाँति ये रहते ।

- रामधारी सिंह दिनकर