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17 June 2018

बाबू जी

घर की बुनियादें दीवारें बामों-दर थे बाबू जी
सबको बाँधे रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी

तीन मुहल्लों में उन जैसी कद काठी का कोई न था
अच्छे ख़ासे ऊँचे पूरे क़द्दावर थे बाबू जी

अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है
अम्मा जी की सारी सजधज सब ज़ेवर थे बाबू जी

भीतर से ख़ालिस जज़बाती और ऊपर से ठेठ पिता
अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी

कभी बड़ा सा हाथ खर्च थे कभी हथेली की सूजन
मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबू जी

-आलोक श्रीवास्तव

19 May 2018

हर मौसम में छोटेलाल



एक चटाई पर सोता है, हर मौसम में छोटेलाल 
पागल है, सपने बोता है, हर मौसम में छोटेलाल

कैसा है किरदार देह का, कोई नहीं समझ पाया
जो कुछ होना है होता है, हर मौसम में छोटेलाल

दीवारों के कान नहीं होते हैं वरना सुन लेते
क्यों हँसता है क्यों रोता है, हर मौसम में छोटेलाल

जो वारिस हैं वो सेवा के संकल्पों को भूल गये
लावारिस लाशें ढोता है, हर मौसम में छोटेलाल

सरकारी दस्तावेजों में तो आजाद लिखा है वो
लेकिन पिंजरे का तोता है, हर मौसम में छोटेलाल

श्वासों के पनघट पर प्रतिदिन आशाओं के साबुन से
दाग जिन्दगी के धोता है, हर मौसम में छोटेलाल

रमता जोगी बहता पानी, यही कहानी 'अज्ञानी '
कुछ पाता है कुछ खोता है, हर मौसम में छोटेलाल

-डा० अशोक अज्ञानी

02 April 2018

आप ग़ज़ल कहते हैं

आप ग़ज़ल कहते हैं इसको, पर ये आग हमारी है
इसको हर पल ज़िन्दा रखने की अपनी लाचारी है.

आईना हूँ, अंधापन हरगिज़ मुझको मंज़ूर नहीं
जैसे को तैसा कहने की अपनी ज़िम्मेदारी है.

खुद्दारी थी अपने आगे करते भी तो क्या करते
गुमनामी से लड़कर आखिर हमने उम्र गुज़ारी है .

पहले दुनिया को बाँचेंगे फिर लिखने की सोचेंगे
हम उनसे हैं दूर जिन्हें बस लिखने की बीमारी है .

पत्थर हैं हम तुम दोनों ही , हम पथ में तुम मंदिर में
क्या तक़दीर तुम्हारी भाई क्या तक़दीर हमारी है !

महफ़िल में तुम ही हरदम बैठे हो आगे की सफ़ में
काश! कभी हमसे भी कहते- 'आज तुम्हारी बारी है'.

गिन गिन कर रक्खे हैं इसमें उसके दिन उसकी रातें
मत खोलो इसको ये उसकी यादों की अलमारी है .

-जय चक्रवर्ती

24 September 2017

ग़मों को सहते ही रहने की

ग़मों को सहते ही रहने की आदत छोड़ आया हूँ
जहाँ पर पाँव जलते थे, मैं वो छत छोड़ आया हूँ

ये चीज़ें भूल जाने की मेरी आदत का क्या कीजे
मैं तेरे दिल में अपने दिल की दौलत छोड़ आया हूँ

'बया' चिड़िया हूँ, औरों के ही मुझको घर बनाने हैं
मैं हर तिनके पे लिख-लिख कर 'मुहब्बत' छोड़ आया हूँ

तू खुद को आईने में देखकर, जब चाहे पढ़ लेना
तेरी आँखों में, जो भी प्यार के ख़त छोड़ आया हूँ

किसी को क्या पता, कितने दिलों के काग़ज़ों से मैं
फ़साना बनके लौटा हूँ, हक़ीक़त छोड़ आया हूँ

रहेगा बचपना जब तक, रहेगी ज़िन्दगी उनमें
बड़ों में नन्हे बच्चों-सी शरारत छोड़ आया हूँ

मुझे अब उम्र भर तदबीर से ही काम लेना है
न जाने कौन से हाथों में क़िस्मत छोड़ आया हूँ

पता भी है तुझ्रे दुनिया, कि तेरे इश्क़ की ख़ातिर
ख़ुदा ने मुझको बख़्शी थी, वो ज़न्नत छोड़ आया हूँ

'कुँअर' कुछ लोग रुसवा भी करेंगे, इतना तो तय है
मैं इस दुनिया की गलियों में जो शोहरत छोड़ आया हूँ

-कुँअर बेचैन