07 May 2018

ढूँढ़ते फिरोगे लाखों में

जिस दिन भी बिछड़ गया प्यारे
ढूँढ़ते फिरोगे लाखों में

फिर कौन सामने बैठेगा
बंगाली भावुकता पहने
दूरों-दूरों से लाएगा
केशों को गंधों के गहने
यह देह अजंता शैली-सी
किसके गीतों में सँवरेगी
किसकी रातें महकाएँगीं
जीने के मोड़ों की छुअनें
फिर चाँद उछालेगा पानी
किसकी समुंदरी आँखों में

दो दिन में ही बोझिल होगा
मन का लोहा, तन का सोना
फैली बाँहों-सा दीखेगा
सूनेपन में कोना-कोना
अपनी रुचि-रंगों के चुनाव
किसके कपड़ों में टाँकोगे
अखरेगा किसकी बातों में
पूरी दिनचर्या ठप होना
दरकेगी सरोवरी छाती
धूलिया जेठ-बैसाखों में

ये गुँथे-गुँथे बतियाते पल
कल तक गूँगे हो जाएँगे
होठों से उड़ते भ्रमर-गीत
सूरज ढलते सो जाएँगे
जितना उड़ती है आयु-परी
इकलापन बढ़ता जाता है
सारा जीवन निर्धन करके
ये पारस पल खो जाएँगे
गोरा मुख लिये खड़े रहना
खिड़की की स्याह सलाखों में

-भारत भूषण

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