20 September 2021

मैं कविता हूँ

मैं कला-कंज की लली-कली, 
मैं कल कूजन हूँ कविता हूँ।
मैं सोए शिशु का सुभग हास,
में शक्ति-स्रोत हूँ सविता हूँ।।

मैं हृदय-सरोवर से निकली
चंचल-गति किंचित चकित-चित्त
भावों के उन्नत-नत भू पर
चढ़ मचल-मचल फिर उतर लहर
लहरों के नूपुर के रव से
यतिमय गतिमय संगीत सुना
शब्दों के झलमल घूँघट से
अर्थों का हिमकर-मुख झलका
फिर सस्मित-सस्मित शरमाती
नयनों से नव रस छलकाती,
प्रिय सरस सिन्धु-उर में विलीन
हो जाने वाली सरिता हूँ।
मैं कविता हूँ, मैं कविता हूँ।।

मैं रण में मस्त जवानों के
निज देश भक्त दीवानों के
कर में धृत कठिन कृपाणों को
बरछी भालों को, वाणों को
झन-झन करती तलवारों को
दुश्मन की छाती फाड़ रक्त
पाई तेगा की धारों को
अति तृप्त दीप्त करने वाली
जागृत ज्वाला भरने वाली
मृत्युंजय वीर प्रसूता हूँ।
में कविता हूँ, मैं कविता हूँ।।

मैं ज्ञान-भक्ति की जननी हूँ
वैराग्य सिखाने वाली हूँ।
शिव, सत्य और सुन्दरता से
सिंचित भू की हरियाली हूँ।
में प्रेम दीवानी मीरा के
दृग की अनुरंजित लाली हूँ।
मैं अनहद नाद कबीरा का
कीर्तन की बजती ताली हूँ।
मैं धर्मप्राण धरती के कण-
कण में भगवान जगाती हूँ।
मैं ऊँच-नीच का भेद मिटा
कर, गीत प्रेम के गाती हूँ।
में मरणोन्मुख मानवता को
अमरत्व दान देने वाली
मैं सघन तिमिर को भेद
जगत में प्रभापुंज भरने वाली, 
मैं त्रिगुण-शक्ति संयुक्त, 
भक्ति-रस-अमृत से सम्पृक्ता हूँ।।
मैं कविता हूँ, मैं कविता हूँ।।

मै चन्द्रमुखी मृगनयनी के
क्वारे गालों की अरुणाई।
मैं अंगराग में रची बसी
मधु मदिर गंध वाली काया-
की कसमस करती तरुणाई।
मैं निर्जन कुंज-कछारों में, 
मद भरे उष्ठ अभिसारों में,
रीझों-खीझों, मनुहारों में, 
यौवन की मस्त बहारों में,
जन-संकुल गृह में लज्जावश
गुपचुप नयनों की बातों में,
प्रेषित पतिकाओं के द्वारा
कठिनाई से कटने वाली
घन घुमड़-घुमड गर्जित असाढ़ 
की तप्त फुहारी रातों में,
बसने वाली श्रृंगार प्रिया
मैं रीति बद्ध, मैं रीति मुक्त
बहु अलंकार संयुक्ता हूँ।
मैं कविता हूँ, मैं कविता हूँ।।

मैं राष्ट्र-भक्ति से ओत-प्रोत
स्वर्णिम अतीत के पृष्ठों पर
अंकित पठनीय कहानी हूँ।
में सघन वेदना में जन्मी
कोमल करुणा कल्याणी हूँ।
मैं जिज्ञासा-कुण्ठा से युत
अंतर्मन की आकुलता हूँ।
अनजाने प्रियतम से मिलने
की आश भरी आतुरता हूँ।
मैं प्रगति मुखी अँगड़ाई में,
संपूर्ण क्रांति के मंत्रों में
काँटों पर टँगी रोशनी के
रंगीन घोषणा-पत्रों में
अनुरक्त व्यक्त होने वाली
कल-कांत कामिनी कविता हूँ।
मैं कविता हूँ, मैं कविता हूँ।

-ईश्वरी यादव
(आजकल/जून, 1992)

06 August 2021

आजाद की माँ का अन्तिम वक्तव्य

 आजाद की माँ का अन्तिम वक्तव्य

(प्रस्तुत कविता एक कवि सम्मेलन के मंच पर सुनाने के उपलक्ष में स्वाधीन भारत की पुलिस ने श्रीकृष्ण सरल जी को गिरफ्तार कर लिया था)


मैं दीपक की बुझने वाली लो-जैसी वृद्धा हूँ,
घृणा घोटती है दम जिसका, मैं ऐसी श्रद्धा हूँ।
दिए विधाता ने जो हैं, मैं वे दिन काट रही है,
जीवित रहकर, मैं अपनी ही किस्मत चाट रही हूँ।

पेट-पीठ हैं एक,भला क्या कोई भूख रही है,
पकी फसल-सी, अरे ! भूख भी दिन-दिन सूख रही है।
दूध मर गया आंचल का, पौरुष के पानी जैसा,
वर्तमान ही मुझे लग रहा, दुखद कहानी जैसा ।

देश-भक्ति के जोश सरोखी, देह लट रही मेरी,
सिंह-सपूतों की गिनती-सी, उमर घट रही मेरी।
छलनी में डाले पानी-सी आस चुक गई मेरी,
दुर्दिन के सम्मान-सरीखी कमर झुक गई मेरी ।

मन की विकृतियों जैसी पड़ गई झुरियाँ तन पर;
बुझी-बुझाई धूनी जैसी राख जमी चिन्तन पर ।
चिर-अतृप्त अभिलाषाओं से, बाल पक गए मेरे,
जीवन-पथ पर चलते-चलते पाँव थक गए मेरे.

देश-द्रोहियों की संख्या-सा, बढ़ दुर्भाग्य रहा है,
कैसे तुम्हें बताऊँ, मैंने क्या-क्या दुःख सहा है ।
मैं माँ हूँ, जिसने अपना बेटा जवान खोया है।
उठ न सकेगा, कई गोलियाँ खाकर बह सोया है।

बेटे के तन में थीं जितनी मातृ-दूध की धारें,
रण-थल में बन गई खून की वे सब प्रखर फुहारें ।
लड़ते-लड़ते खेत रहा था सिंह- सूरमा मेरा,
देख नहीं पाया आजादी का वह स्वर्ण-सवेरा ।

बोले लोग, चिताओं पर मेले हर बरस लगेंगे;
मरे वतन के लिए, फूल उनकी स्मृति पर बरसेंगे।
पर अब मेले कहाँ लग रहे, कोई मुझे बताए,
कौन लद रहा, फूलों से, कोई मुझको समझाए ।

जिन लोगों की लाशों पर चल कर आज दी आई,
उनकी याद बहुत ही गहरी लोगों ने दफनाई।
उनके अपने, आज रोटियों के दर्शन को तरसे
स्वर्ण- मेघ, पर और किसी के आँगन में जा बरसे ।

पता नहीं था, इस धरती पर ऐसे दिन आएंगे,
नोंच - नोंचकर आजादी का मांस गिद्ध खाएंगे।
पता नहीं था, समय बदलते आँख बदल जाएगी,
मानवता की अर्थी, इतने शीध्र निकल जाएगी।

एक ओर नंगी लाशों को कफन नहीं मिल पाए।
और दूसरी ओर दिवाली नित्य मनाई जाए।
क्यों न दलित-पीड़ित की आहों में उफान फिर आए,
क्यों न किसी की घुटन, आग अभिशापों की बरसाए ?

क्यों न किसी की कोख पूत फिर से ऐसा जन्माए,
जो कि गरुड़ बन, महा-भयंकर नागों को खा जाए।
लगता भारत की नारी का फिर मातृत्व जगेगा,
बलिदानी वीरों का मेला फिर से यहाँ लगेगा।

फिर मुझ-जैसी कोई मां, कोई आजाद जनेगी;
किसी चन्द्रशेखर की फिर यौवन-गंगा उफनेगी।
पाप- पुन्ज पर फिर विनाश - ज्वाला वह लहराएगी,
उसकी भूख किसी अन्यायी को फिर से खाएगी।

अन्यायों के मस्तक पर वह फिर गोली दागेगा,
सुन उसकी विस्फोट - गर्जना फिर यह युग जागेगा।
शोषण करने वालों का आसन फिर से डोलेगा,
नया सवेरा इस धरती पर तब आँखें खोलोगा।

-श्रीकृष्ण सरल

29 May 2021

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17 May 2021

पर तुम्हें भूला नहीं हूँ



मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ, पर तुम्हें भूला नहीं हूँ।

चल रहा हूँ, क्योंकि चलने से थकावट दूर होती,
जल रहा हूँ क्योंकि जलने से तिमिस्रा चूर होती,
गल रहा हूँ क्योंकि हल्का बोझ हो जाता हृदय का,
ढल रहा हूँ क्योंकि ढलकर साथ पा जाता समय का।

चाहता तो था कि रुक लूँ पार्श्व में क्षण-भर तुम्हारे
किन्तु अगणित स्वर बुलाते हैं मुझे बाँहें पसारे,
अनसुनी करना उन्हें भारी प्रवंचन कापुरुषता
मुँह दिखाने योग्य रक्खेगी न मुझको स्वार्थपरता।
इसलिए ही आज युग की देहली को लाँघ कर मैं-
पथ नया अपना रहा हूँ
पर तुम्हें भूला नहीं हूँ।

ज्ञात है कब तक टिकेगी यह घड़ी भी संक्रमण की
और जीवन में अमर है भूख तन की, भूख मन की
विश्व-व्यापक-वेदना केवल कहानी ही नहीं है
एक जलता सत्य केवल आँख का पानी नहीं है।

शान्ति कैसी, छा रही वातावरण में जब उदासी
तृप्ति कैसी, रो रही सारी धरा ही आज प्यासी
ध्यान तक विश्राम का पथ पर महान अनर्थ होगा
ऋण न युग का दे सका तो जन्म लेना व्यर्थ होगा।
इसलिए ही आज युग की आग अपने राग में भर-
गीत नूतन गा रहा हूँ
पर तुम्हें भूला नहीं हूँ।

सोचता हूँ आदिकवि क्या दे गये हैं हमें थाती
क्रौञ्चिनी की वेदना से फट गई थी हाय छाती
जबकि पक्षी की व्यथा से आदिकवि का व्यथित अन्तर
प्रेरणा कैसे न दे कवि को मनुज कंकाल जर्जर।

अन्य मानव और कवि में है बड़ा कोई न अन्तर
मात्र मुखरित कर सके, मन की व्यथा, अनुभूति के स्वर
वेदना असहाय हृदयों में उमड़ती जो निरन्तर
कवि न यदि कह दे उसे तो व्यर्थ वाणी का मिला वर
इसलिए ही मूक हृदयों में घुमड़ती विवशता को-
मैं सुनाता जा रहा हूँ
पर तुम्हें भूला नहीं हूँ।

आज शोषक-शोषितों में हो गया जग का विभाजन
अस्थियों की नींव पर अकड़ा खड़ा प्रासाद का तन
धातु के कुछ ठीकरों पर मानवी-संज्ञा-विसर्जन
मोल कंकड़-पत्थरों के बिक रहा है मनुज-जीवन।

एक ही बीती कहानी जो युगों से कह रहे हैं
वज्र की छाती बनाए, सह रहे हैं, रह रहे हैं
अस्थि-मज्जा से जगत के सुख-सदन गढ़ते रहे जो
तीक्ष्णतर असिधार पर हँसते हुए बढ़ते रहे जो
अश्रु से उन धूलि-धूसर शूल जर्जर क्षत पगों को-
मैं भिगोता जा रहा हूँ
पर तुम्हें भूला नहीं हूँ।

आज जो मैं इस तरह आवेश में हूँ अनमना हूँ
यह न समझो मैं किसी के रक्त का प्यासा बना हूँ
सत्य कहता हूँ पराए पैर का काँटा कसकता
भूल से चींटी कहीं दब जाय तो भी हाय करता

पर जिन्होंने स्वार्थवश जीवन विषाक्त बना दिया है
कोटि-कोटि बुभुक्षितों का कौर तलक छिना लिया है
'लाभ शुभ' लिख कर ज़माने का हृदय चूसा जिन्होंने
और कल बंगालवाली लाश पर थूका जिन्होंने।

बिलखते शिशु की व्यथा पर दृष्टि तक जिनने न फेरी
यदि क्षमा कर दूँ उन्हें धिक्कार माँ की कोख मेरी
चाहता हूँ ध्वंस कर देना विषमता की कहानी
हो सुलभ सबको जगत में वस्त्र, भोजन, अन्न, पानी।
नव भवन निर्माणहित मैं जर्जरित प्राचीनता का-
गढ़ ढ़हाता जा रहा हूँ।
पर तुम्हें भूला नहीं हूँ।

-शिवमंगल सिंह सुमन

व्यथा एक जेबकतरे की


कोरोना से प्यारे अपना क्या हाल हो गया
जेबें ढीली पड़ गईं
 और
पेट से पीठ का मिलन हो गया।
पॉकेटमार नाम है अपना
और
राम नाम जपना पराया माल हो अपना।
अच्छा धंधा था 
यह अपना
लोगों की भारी भारी जेबों को
'हाथ की सफाई' से हल्की करना
फिर चैन से खाना-पीना और सोना।
अब कोरोनाकाल में
वही हाथ धो धो क 
ये 'कलाकार' निढाल हो गया।
कोरोना से प्यारे अपना....

जब नगर में दिन प्रतिदिन
लगते थे कई कई ठेले मेले
खुशी-खुशी उनमें हमने
कई कई बार हैं धक्के झेले
लोगों की जेबों पर  अपनी
उंगलियों की कृपा बरसाई
इन हाथों, न जाने कितने
बटुओं और नोटों की 
जान है बचाई।
एक अरसा हो चुका है यहांँ
हरियाली देखे हुए
हरा-भरा मैदान अब रेगिस्तान हो गया
कोरोना से प्यारे.....

हाथों की कसरत नहीं हुई है
कलाइयांँ  व उंगलियाँ अकड़ गईं हैं
लोगों की रेलमपेल देखने को
अखियाँ तरस गई हैं
फाका द्वार पीट रहा है
धंधा खटिया पकड़े हुए हैं
अच्छा खासा सुखी जीवन
बदहाल हो गया ।
कोरोना से प्यारे......

सूने हैं मस्जिद, मन्दिर
और गिरजाघर, गुरुद्वारे
भटक रहे हैं ब्लेड सहित
गली-मोहल्ले द्वारे द्वारे
खाली हाथ लौट-लौटकर
हम मरीज और कमरा अपना
आज अस्पताल हो गया।
कोरोना से प्यारे....

किसको सुनाएँ दुखड़ा अपना
किसे पढाएंँ यह अफसाना
हम मेहनतकश बंदों की
इतनी अच्छी कला का
बंटाढार हो गया।
कोरोना से प्यारे अपना
क्या हाल हो गया।

-डा० रामकुमार माथुर
अजमेर, राजस्थान.

10 May 2021

मुक्तक

कर्म का दीप जला जाता है। 
दर्द का शैल गला जाता है। 
वक्त को कौन रोक पाया है, 
वक्त आता है, चला जाता है।। 

-डॉ अशोक अज्ञानी 

29 November 2020

औरतें


कुछ औरतों ने अपनी इच्छा से कूदकर जान दी थी
ऐसा पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज है
और कुछ औरतें अपनी इच्छा से चिता में जलकर मरी थीं
ऐसा धर्म की किताबों में लिखा हुआ है
मैं कवि हूँ, कर्ता हूं, क्या जल्दी है
मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित दोनों को एक साथ
औरतों की अदालत में तलब करूंगा
और बीच की सारी अदालतों को मंसूख कर दूंगा
मैं उन दावों को भी मंसूख कर दूगा,
जो श्रीमानों ने औरतों और बच्चों के खिलाफ पेश किए हैं
मैं उन डिक्रियों को भी निरस्त कर दूंगा
जिन्हें लेकर फौजें और तुलबा चलते हैं
मैं उन वसीयतों को खारिज कर दूंगा
जो दुर्बलों ने भुजबलों के नाम की होगी
मैं उन औरतों को
जो अपनी इच्छा से कुएं में कूदकर
और चिता में जलकर मरी हैं
फिर से जिंदा करूंगा और उनके बयानात
दोबारा कलमबंद करूंगा
कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया?
कहीं कुछ बाकी तो नहीं रह गया?
कि कहीं कोई भूल तो नहीं हुई?
क्योंकि में उस औरत के बारे में जानता हूं
जो अपने सात बित्ते की देह को एक बिते के आंगन में
ता-जिंदगी समोए रही और कभी बाहर झांका तक नहीं
और जब बाहर निकली वह तो कहीं उसकी लाश निकली
औरत की लाश धरती माता की तरह होती है
जो खुले में फैल जाती है थानों से लेकर अदालतों तक
औरतें रोती जाती हैं, मरद मारते जाते हैं
औरते रोती है. मरद और मारते हैं
औरतें खूब जोर से रोती है।
मरद इतनी जोर से मारते हैं कि वे मर जाती हैं
इतिहास में वह पहली औरत कौन थी जिसे
सबसे पहले जलाया गया?
में नहीं जानता
लेकिन जो भी रही हो मेरी मां रही होगी,
मेरी चिंता यह है कि भविष्य में वह आखिरी स्त्री कौन होगी
जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा?
मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी होगी मेरी बेटी होगी
और यह मैं नहीं होने दूंगा।

-रमाशंकर यादव विद्रोही
रमाशंकर यादव 'विद्रोही' की एक कविता.
(3 दिस.1957- 8 दिस.2015) 

23 July 2020

Alha

हिआँ कि बातइँ हिअनइँ छोड़उ, अब आगे को सुनउ हबाल।
खोलि पत्तिरा देखन लागे, अउ ज्युतिस को करइँ विचार।
साइति अबहीं अति नीकी हइ, अइपनबारी देउ पठाइ।
हाँत जोरि के रुपना बोलो, दादा सुनउँ हमारी बात।
मेरे भरोसे मइँ ना रहिअउ, मइँ ना मूँड़ कटइहउँ जाइ।
जालिम राजा नइनागढ़ को, जाकी मारु सही ना जाइ।
तड़पे ऊदन तब रुपना पइ, रुपना सुनिलेउ बात हमारा।
नउकर-चाकर तुमइँ न जानों, तुम तउ भइआ लगउ हमारा।
आल्हा ब्याहन कउ ना रहिअइँ, बातइँ कहिबे कउ रहि जाइँ।
रुपना बोलइ तब मलिखे सइ, दादा सुनउ हमारी बात।
घोड़ा करिलिया आल्हा बारो, सो मोइ आप देउ मँगवाइ।
अइपनबारी तउ लइ जइहउ,ँ जो दइ देउ ढाल तलवार।
सब हथियार दए मलिखे नइँ, अउ दइ दई ढाल तलवार।
रुपना करिलिया पइ चढ़ि बइठो, नइनागढ़ मइँ पहुँचो जाइ।
तब दरमानी बोलन लागो, ओ परदेसी बात बताउ।
कहाँ सइ आए हउ, कहाँ जइहउ, अपनो कहउ देस को नाउँ।
देसु हमारो नगर महाबो, जहँ पइ बसइ रजा परमाल।
आल्हा ब्याहन कउ आए हइँ, रुपना बारी नामु हमार।
अइपन बारी हम लाए हइँ, राजइ खबरि सुनाबउ जाइ।
साइति बीतति हइ दुआरे की, हमरो नेगु देउ मँगबाइ।
कहा नेगु द्वारे को चहिए, राजइ खबरि सुनाबइँ जाइ।
रुपना बोलो दरमानी सइ, अइसी कहउ जाइ महराज।
चारि घरी भरि चलइ सिरोही, द्वारे बहइ रकत की धार।
इतनी सुनिके दरमानी नइँ, राजइ खबरि सुनाई जाइ।
अइपनबारी बारी लाओ, अउ द्वारे पइ पहुँचो आइ।
आल्हा ब्याहन कउ आए हइँ, झण्डा धुरे दओ गड़वाइ।
झिगरइ नेगी दरबाजे पइ, द्वारे कठिन चलइ तलवारि।
अइसो नेगी मइँ ना देखो, मोपइ कूछ कही ना जाइ।

12 May 2020

घरबंदी में

=गीत =
घरबंदी में

अहा! कुदरती छटा!
तुम्हारा अभिनन्दन है।

पहले गरलपान करना मज़बूरी थी
हवा प्रदूषित थी, कितनी ज़हरीली थी
शीतल-मंद-सुगंध पवन अब है अमृत
पहले आँखें जलन भरी थीं, गीली थीं
मलय समीर सुवासित है
चंदन-चंदन है।

पहले कहाँ दिखाई देती गौरैया
अब तो चीं-चीं चहक देख इठलाता हूँ
सुबह-शाम दाना-पानी हूँ रख देता
देख फुदकती, गौरैया हो जाता हूँ
पाखी बन उड़ान भरता
यह पाखी मन है।

देख भौंकते कुत्ते को गुस्सा हो आता
खलल नींद में पड़ती थी तो था झल्लाता
रोज उसे रोटी देना जब शुरू किया
लावारिस होकर भी पूँछ हिला जाता
पौधों को दुलराने से
ही मन प्रसन्न है।

घरबंदी में बंद हुआ जब से घर में
दिल का दरवाजा खुलता ही चला गया
नज़रबंद होने पर मन की आँख खुली
अब तक तो अपनों के हाथों छला गया
कुदरत के संग जीना
ही सच्चा जीवन है।
अहा! कुदरती छटा!
तुम्हारा अभिनन्दन है।

-भगवती प्रसाद द्विवेदी 

21 April 2020

जंग लड़ेंगे हम

जंग लड़ेंगे हम

जंग वायरस ने छेड़ी है
जंग लड़ेंगे हम
और जंग में
विजयी होकर ही
निकलेंगे हम ।

घर में रहकर
वाच करेंगे
इसकी चालों को
आश्रय देंगे
भूखे, प्यासे,
बिन घरवालों को
कर इसको कमजोर
प्राण इसके
हर लेंगे हम ।

अजब तरह का
ये दुश्मन है
कुशल खिलाड़ी है
छोटा है पर
छिपी पेट में
इसके दाढ़ी है
छिपकर
वार कर रहा है,
लेकिन सँभलेंगे हम ।

घुट्टी पीकर
चला चीन से
दुनिया में छाया
पूरा विश्व
अभी तक इसको
पकड़ नहीं पाया
बड़े जतन से
जाल बिछा
इसको जकड़ेंगे हम ।

मचा हुआ कुहराम
हर जगह
बाहर औ भीतर
कोस रही है
दुनिया इसको
पानी पी-पीकर
डरना नहीं
व्योम इससे
जल्दी उभरेंगे हम ।
जंग वायरस ने छेड़ी है ......

-डा० जगदीश व्योम