06 August 2021

आजाद की माँ का अन्तिम वक्तव्य

 आजाद की माँ का अन्तिम वक्तव्य

(प्रस्तुत कविता एक कवि सम्मेलन के मंच पर सुनाने के उपलक्ष में स्वाधीन भारत की पुलिस ने श्रीकृष्ण सरल जी को गिरफ्तार कर लिया था)


मैं दीपक की बुझने वाली लो-जैसी वृद्धा हूँ,
घृणा घोटती है दम जिसका, मैं ऐसी श्रद्धा हूँ।
दिए विधाता ने जो हैं, मैं वे दिन काट रही है,
जीवित रहकर, मैं अपनी ही किस्मत चाट रही हूँ।

पेट-पीठ हैं एक,भला क्या कोई भूख रही है,
पकी फसल-सी, अरे ! भूख भी दिन-दिन सूख रही है।
दूध मर गया आंचल का, पौरुष के पानी जैसा,
वर्तमान ही मुझे लग रहा, दुखद कहानी जैसा ।

देश-भक्ति के जोश सरोखी, देह लट रही मेरी,
सिंह-सपूतों की गिनती-सी, उमर घट रही मेरी।
छलनी में डाले पानी-सी आस चुक गई मेरी,
दुर्दिन के सम्मान-सरीखी कमर झुक गई मेरी ।

मन की विकृतियों जैसी पड़ गई झुरियाँ तन पर;
बुझी-बुझाई धूनी जैसी राख जमी चिन्तन पर ।
चिर-अतृप्त अभिलाषाओं से, बाल पक गए मेरे,
जीवन-पथ पर चलते-चलते पाँव थक गए मेरे.

देश-द्रोहियों की संख्या-सा, बढ़ दुर्भाग्य रहा है,
कैसे तुम्हें बताऊँ, मैंने क्या-क्या दुःख सहा है ।
मैं माँ हूँ, जिसने अपना बेटा जवान खोया है।
उठ न सकेगा, कई गोलियाँ खाकर बह सोया है।

बेटे के तन में थीं जितनी मातृ-दूध की धारें,
रण-थल में बन गई खून की वे सब प्रखर फुहारें ।
लड़ते-लड़ते खेत रहा था सिंह- सूरमा मेरा,
देख नहीं पाया आजादी का वह स्वर्ण-सवेरा ।

बोले लोग, चिताओं पर मेले हर बरस लगेंगे;
मरे वतन के लिए, फूल उनकी स्मृति पर बरसेंगे।
पर अब मेले कहाँ लग रहे, कोई मुझे बताए,
कौन लद रहा, फूलों से, कोई मुझको समझाए ।

जिन लोगों की लाशों पर चल कर आज दी आई,
उनकी याद बहुत ही गहरी लोगों ने दफनाई।
उनके अपने, आज रोटियों के दर्शन को तरसे
स्वर्ण- मेघ, पर और किसी के आँगन में जा बरसे ।

पता नहीं था, इस धरती पर ऐसे दिन आएंगे,
नोंच - नोंचकर आजादी का मांस गिद्ध खाएंगे।
पता नहीं था, समय बदलते आँख बदल जाएगी,
मानवता की अर्थी, इतने शीध्र निकल जाएगी।

एक ओर नंगी लाशों को कफन नहीं मिल पाए।
और दूसरी ओर दिवाली नित्य मनाई जाए।
क्यों न दलित-पीड़ित की आहों में उफान फिर आए,
क्यों न किसी की घुटन, आग अभिशापों की बरसाए ?

क्यों न किसी की कोख पूत फिर से ऐसा जन्माए,
जो कि गरुड़ बन, महा-भयंकर नागों को खा जाए।
लगता भारत की नारी का फिर मातृत्व जगेगा,
बलिदानी वीरों का मेला फिर से यहाँ लगेगा।

फिर मुझ-जैसी कोई मां, कोई आजाद जनेगी;
किसी चन्द्रशेखर की फिर यौवन-गंगा उफनेगी।
पाप- पुन्ज पर फिर विनाश - ज्वाला वह लहराएगी,
उसकी भूख किसी अन्यायी को फिर से खाएगी।

अन्यायों के मस्तक पर वह फिर गोली दागेगा,
सुन उसकी विस्फोट - गर्जना फिर यह युग जागेगा।
शोषण करने वालों का आसन फिर से डोलेगा,
नया सवेरा इस धरती पर तब आँखें खोलोगा।

-श्रीकृष्ण सरल

1 comment:

Dr.Wahab said...

नमस्ते आदरणीय व्योम जी, आज़ाद की मां के इस अंतिम वक्तव्य में प्रेरणा है । नया सवेरा नई उम्मीद का प्रतीक है । युवा के लिए बलिदान का संदेश है । आपने इस कविता को पोस्ट कर पढ़ने और जानने का अवसर प्रदान किया है । आभार आपका ।🙏