16 September 2022

ये पहाड़ी औरतें

ये पहाड़ी औरतें

ये पहाड़ी औरतें
भोर के उजास में
लगा कर विश्वास की
माथे पर बिंदिया,
पहन कर नथनी
नाक में अभिमान की,
लपेट कर पल्लू
कमर में जोश का,
चल पड़तीं काम पर
अपनी ही धुन में,
ये पहाड़ी औरतें

पीठ पर ढ़ोकर
जीवन का बोझ
पहाड़ी ढलानों पर
चढ़ते-उतरते
बुनती हैं ख्वाब
कभी साथी की
याद में हुलसतीं
कभी विरही गीत
गुनगुनाती जातीं,
ये पहाड़ी औरतें

रात चाँदनी में नहा
चाँद से बातें करतीं
कभी उल्हाने देतीं
कभी पूछतीं पता
परदेसी पिया का,
ये पहाड़ी औरतें

सखी सहेली-सी
आशाएँ साथ लिये
हँसी-ठिठोली करतीं
रात के सूने पहर में 
देख पाँवों के ज़ख्म
कराह उठती हैं
ये पहाड़ी औरतें।

-रेणु चन्द्रा माथुर 
केलिफोर्निया

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