30 December 2014

सर्दी के दोहे

आंगन कभी मुंडेर पर, झलके उसका रूप।
आँख-मिचौली खेलती, है जाड़े की धूप।।

आई ठिठकी और फिर, लोप हो गई धूप।
जाते जाते ठंड का, थमा गई प्रारूप।।

सूरज दुबका गगन में, डाल धुंध की शाल।
ठंड कलेजा चीरती, लोग हुए बेहाल।।

जीवन हिम-सा हो रहा, हवा चलाये तीर।
मलता रहे हथेलियाँ, अकड़ा हुआ शरीर।।

होंठ रहे हैं थरथरा, काँप रहे हैं गात।
धुआं-धुआं सी हो रही, मुंह से निकली बात।।

युवा-वृद्ध-नर-नारियाँ, क्या भोगी क्या संत।
सभी मनाते हैं यही, आये शीघ्र वसंत।।

-शैलेन्द्र शर्मा


2 comments:

yashoda agrawal said...

आपकी लिखी रचना मेरी अंतिम में पोस्ट दिन बुधवार 31 दिसम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

ऋषभ शुक्ला said...

आपका ब्लॉग मुझे बहुत अच्छा लगा, और यहाँ आकर मुझे एक अच्छे ब्लॉग को फॉलो करने का अवसर मिला. मैं भी ब्लॉग लिखता हूँ, और हमेशा अच्छा लिखने की कोशिस करता हूँ. कृपया मेरे ब्लॉग पर भी आये और मेरा मार्गदर्शन करें.

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