04 July 2013

मन होता है पारा


मन होता है पारा
ऐसे देखा नहीं करो !

यह मुसकान तुम्हारी
डूबी हुई शरारत में
उलझा-उलझा खत हो
जैसे साफ़ इबारत में

रह-रह कर दहकेगा
प्यासे होंठों पर अंगारा
ऐसे देखा नहीं करो !

कौन बचाकर आँख
सुबह की नींद उघार गया
बूढ़े सूरज पर पीछे से
सीटी मार गया

हम पर शक पहले से है,
तुम करके और इशारा
ऐसे देखा नहीं करो !

होना-जाना क्या है
जैसा कल था वैसा कल
मेरे सन्नाटे में बस
सूनेपन की हलचल

अंधियारे की नेम-प्लेट पर
लिख-लिख कर उजियारा
ऐसे देखा नहीं करो !
मन होता है पारा
ऐसे देखा नहीं करो !

-रामानंद दोषी

2 comments:

yashoda agrawal said...

आपने लिखा....
हमने पढ़ा....
और लोग भी पढ़ें;
इसलिए शनिवार 06/07/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
पर लिंक की जाएगी.
आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
लिंक में आपका स्वागत है .
धन्यवाद!

expression said...

मन होता है पारा...एक दम तरल..सच!!!!

सुन्दर भाव..

अनु