08 April 2005

बाजीगर बन गई व्यवस्था

बाजीगर बन गई व्यवस्था
हम सब हुए जमूरे सपने कैसे होंगे पूरे
चार कदम भर चल पाये थे
पैर लगे थर्राने
क्लांत प्रगति की निरख विवशता
छाया लगी चिढाने
मन के आहत मृगछौने ने
बीते दिवस बिसूरे
सपने कैसे होंगे पूरे
हमने निज हाथों से युग पतवार जिन्हें पकड़ाई
वे शोषक हो गये हुए हम चिरशोषित तरुणाई
शोषण दुर्ग हुआ अलवत्ता
तोड़ो जीर्ण कँगूरे सपने कैसे होंगे पूरे
वे तो हैं स्वच्छन्द करेंगे
जो मन में आएगा
सूरज को गाली देंगे
कोई क्या कर पायेगा
दोष व्यक्ति का नहीं
व्यवस्था में छलछिद्र घनेरे
सपने कैसे होंगे पूरे
मिला भेड़ियों को भेड़ों की
अधिरक्षा का ठेका
कुछ सफेदपोषों को मैंने
देश निगलते देखा
स्वाभिमान को बेंच
उन्हें मैं कैसे नमन करूँ रे
सपने कैसे होंगे पूरे

डा० जगदीश व्योम



6 comments:

Debashish said...

जगदीश, आपका हार्दिक स्वागत है हिन्दी ब्लॉग जगत में :)

Jitendra Chaudhary said...

जगदीश जी, आपका हिन्दी ब्लागजगत के पारिवार मे हार्दिक स्वागत है.
आपके ब्लाग की परिकल्पना अच्छी दिख रही है.
किसी भी प्रकार की सहायता के लिये हम सिर्फ एक इमेल की दूरी पर है.

Kalicharan said...

Jagdish ji wadaakam bahut bhadiya hai blog jagat main hindi writers badte jaa rahe hain.

Raman said...

हिन्दी ब्लाग शुरू करने के लिये बहुत बहुत बधाईयां. आपके और हाईकूओं का इन्तज़ार रहेगा.

Vijay Thakur said...

चिट्ठा जगत में आपके पधारने से हर्षित हैं हिन्दी चिट्ठाकार समाज।

जब तक साहित्य ज़िंदा है, न केवल सपने जीवित रहेंगे बल्कि पूरे भी होंगे।
स्वागत है आपका।

Rati Saxena said...

jagdeesh ji, blog par kavitaaaye dkh accha lag raha he
Rati saxena

http://ratisaxena.blogspot.com