04 April 2005

छन्द

छन्द
मस्त मँजीरा खनकाय रही मीरा
और रस की गगरियाँ रसखान ढरकावैं हैं
संग संग खेलैं खेल सूर ग्वाल बालन के
दुहि पय धेनु को पतूखी में पिवाबैं हैं
कूटि कूटि भरे लोकतत्व के सकोरा
गीत गाथन की ध्वनि जहाँ कान परि जावै है
ऍसी ब्रजभूमि एक बेर देखिवे के काज
देवता के देवता को मनु ललचावै है.
डा० जगदीश व्योम

5 comments:

Atul Arora said...

उगने लगे
कंकरीट के वन
उदास मन.

मरने न दो
परम्पराएँ कभी
बचोगे तभी

मिलने भी दो
राम और ईसा को
भिन्न हैं कहाँ.

छिड़ा जो युद्ध
रोयेगी मानवता
हँसेंगे गिद्ध.

कुछ कम हो
शायद ये कुहासा
यही प्रत्याशा.

डॉ॰ व्योम said...

हाइकु मूलतः जापानी कविता है. केवल १७ अक्षर में पूरी कविता हो जाती है.पहली पंक्ति में ५ अक्षर दूसरी में ७ अक्षर और तीसरी पंक्ति में ५ अक्षर होते हैं.
हाइकु वर्तमान की बहुचर्चित कविता है.
डा० जगदीश व्योम

डॉ॰ व्योम said...

Haiku

डॉ॰ व्योम said...
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Anonymous said...

an excellent effort
k.p.mishra