08 April 2005

हाइकु

हाइकु कविताएँ

छिड़ा जो युद्ध
रोयेगी मानवता
हँसेंगे गिद्ध.

धूप के पाँव
थके अनमने से
बैठे सहमें.

सहम गई
फुदकती गौरैया
शुभ नहीं ये.

मैं न बोलूँगा
बोलेंगी कविताएँ
व्यथा मन की.

यूँ ही न बहो
पर्वत सा ठहरो
मन की कहो.

पतंग उड़ी
डोर कटी बिछुड़ी
फिर न मिली.

: डा० जगदीश व्योम :

2 comments:

namaste said...
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namaste said...

जगदीश जी

आपकी हाइकु पढ़कर बिलकुल ख़ुश हो गया. कभी सोचा ही नहीं था, हिंदी में हाइकु होती है!!

मगर नियमित तौर हाइकु कविता में ऋतु-वर्णात्मक शब्द ( जिसे जापानी में "季語 किगो" कहते हैं ) का एक ज़िक्र करना ज़रूरी तो नहीं? कैसी होती है?