14 February 2014

आहत है संवेदना

आहत है संवेदना, खण्डित है विश्वास ।
जाने क्यों होने लगा, संत्रासित वातास ।।

-डा॰ जगदीश व्योम

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इस दोहे पर फेसबुक पर लिखी गई विद्वानों की टिप्पणियों को यहाँ पोस्ट किया जा रहा है--

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इस दोहे के अनुसार मेरे विचार से रचनाकार विश्वास टूटने से आहत है और उसे अनायास अपने आसपास का वायुमंडल ही निराश करता हुआ प्रतीत होता है ...आपने सही कहा हम सभी के आसपास यही वातावरण है ...मगर फिर भी कुछ अच्छे लोग इस अँधेरे में मशाल लिए मिल ही जाते हैं



-संध्या सिंह



आजकल लोगों में आपसी प्रेम ,सद्भाव और सहानुभूति की कमी देखने को मिलती है .लोग स्वकेंद्रित होते जा रहे है .अतः आपस का विश्वास टूटता जा रहा है हर व्यक्ति दूसरों को संदेह की दृष्टि से देखता है आपस में ,अपनों से भी भयभीत रहता है ..पूरा वातावरण ही ऐसा हो उठा है



-ज्योतिर्मयी पन्त



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भौतिकतावादी समाज की विडंबना को उकेरनेवाला पुष्ट दोहा है ! किन्तु मित्र 'आहत संवेदना' और 'खंडित विश्वास' ही घोषित कर रहे है कि ये मानव-मूल्य शून्य नहीं हो गये हैं ! खंडित ही सही , पर संवेदना और विश्वास अभी भी अस्तित्वमान हैं ! मेरा दृढ विश्वास है कि "शून्य कभी होंगे भी नहीं"........ ! मानव-मूल्यों के पक्षधर तो बहुसंख्य हो सकते हैं, उनसे समृद्ध लोग अल्पसंख्यक ही होते हैं ! निजी स्तर पर सम्वेदना का आहत होना और विश्वास का खंडित होना बड़ी दुर्घटना है, इससे दशों दिशाएं अंधकारमय लगने लगती हैं , पर समाज में ये मूल्य अभी भी हैं और रहेंगे , तभी तो कविता जीवित है, कलाएं जीवित हैं !



-डा० धनंजय सिंह



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"जाने क्यों होने लगा" अब यह कोई यक्ष प्रश्न नहीं रह गया है.यथार्थ के धरातल पर अपने अपने स्तर से इसका उत्तर दिया जा रहा है. अभी "वीर विहीन मही" वाली स्थिति नहीं आई है और न ही इसकी कोई सम्भावना है. प्रेम अपने शाश्वत रूप में अभी भी विदयमान है. कवियों/रचनाकारों/मानवता के शुभचिंतकों की आपके दोहे से तादात्म्यता आपके दोहे का उत्तर है.



-रामशंकर वर्मा

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बहुत चमत्कारपूर्ण दोहा है ! "जाने क्यों होने लगा ?" प्रश्न का उत्तर स्वयं रचना ही दे रही है : क्योंकि विश्वास खंडित हो चुका है ( इसलिए आश्वासन बेमानी हो गए हैं ); क्योंकि संवेदनाएँ क्षरित हो चुकी हैं ( परिणामतः किसी के दुःख-दर्द से किसी का कोई सरोकार नहीं) ! खंड-खंड जीवन और त्रासद अकेलापन, इसी विडम्बना से जूझते हम सब !


-अश्विनी कुमार विष्णु

1 comment:

Dr.jagdish vyom said...

इस दोहे पर फेसबुक पर लिखी गई विद्वानों की टिप्पणियों को यहाँ पोस्ट किया जा रहा है--
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इस दोहे के अनुसार मेरे विचार से रचनाकार विश्वास टूटने से आहत है और उसे अनायास अपने आसपास का वायुमंडल ही निराश करता हुआ प्रतीत होता है ...आपने सही कहा हम सभी के आसपास यही वातावरण है ...मगर फिर भी कुछ अच्छे लोग इस अँधेरे में मशाल लिए मिल ही जाते हैं

-संध्या सिंह

आजकल लोगों में आपसी प्रेम ,सद्भाव और सहानुभूति की कमी देखने को मिलती है .लोग स्वकेंद्रित होते जा रहे है .अतः आपस का विश्वास टूटता जा रहा है हर व्यक्ति दूसरों को संदेह की दृष्टि से देखता है आपस में ,अपनों से भी भयभीत रहता है ..पूरा वातावरण ही ऐसा हो उठा है

-ज्योतिर्मयी पन्त

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भौतिकतावादी समाज की विडंबना को उकेरनेवाला पुष्ट दोहा है ! किन्तु मित्र 'आहत संवेदना' और 'खंडित विश्वास' ही घोषित कर रहे है कि ये मानव-मूल्य शून्य नहीं हो गये हैं ! खंडित ही सही , पर संवेदना और विश्वास अभी भी अस्तित्वमान हैं ! मेरा दृढ विश्वास है कि "शून्य कभी होंगे भी नहीं"........ ! मानव-मूल्यों के पक्षधर तो बहुसंख्य हो सकते हैं, उनसे समृद्ध लोग अल्पसंख्यक ही होते हैं ! निजी स्तर पर सम्वेदना का आहत होना और विश्वास का खंडित होना बड़ी दुर्घटना है, इससे दशों दिशाएं अंधकारमय लगने लगती हैं , पर समाज में ये मूल्य अभी भी हैं और रहेंगे , तभी तो कविता जीवित है, कलाएं जीवित हैं !

-डा० धनंजय सिंह

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"जाने क्यों होने लगा" अब यह कोई यक्ष प्रश्न नहीं रह गया है.यथार्थ के धरातल पर अपने अपने स्तर से इसका उत्तर दिया जा रहा है. अभी "वीर विहीन मही" वाली स्थिति नहीं आई है और न ही इसकी कोई सम्भावना है. प्रेम अपने शाश्वत रूप में अभी भी विदयमान है. कवियों/रचनाकारों/मानवता के शुभचिंतकों की आपके दोहे से तादात्म्यता आपके दोहे का उत्तर है.

-रामशंकर वर्मा