23 December 2012

रपट , संगमन-18



शब्द सत्ता की अस्मिता व प्रभाव की चिन्ता और चर्चा

हिन्दी कथा-विमर्श को समर्पित अपनी तरह के सबसे अलग संवाद-मंच ‘संगमन’  का 18वाँ समागम सोलन (हि0प्र0) की खूबसूरत पहाड़ियों पर 5120 फुट की ऊँचाई पर अवस्थित बड़ोग में 25 से 27 नवम्बर 2012 तक आयोजित किया गया। वर्ष 1993 से देश के विभिन्न शहरों में आयोजित होने वाले इस सचल वार्षिक आयोजन में इस वर्ष का विषय था ‘शब्द सत्ता’ तथा इसके संयोजक थे प्रियंवद, जबकि स्थानीय संयोजक की भूमिका निभाई कथाकार एस0आर0 हरनोट ने। पूर्व में संगमन के आयोजन कानपुर, चित्रकूट, दुधवा, धनबाद, वृन्दावन, अहमदाबाद, देहरादून, सारनाथ, श्रीडूंगरगढ़, पिथौरागढ़, जमशेदपुर, नैनीताल, ग्वालियर, उदयपुर, कुशीनगर और मांडू में सम्पन्न हुए थे। 
तीन सत्रों के इस आयोजन में उद्घाटन सत्र का संचालन करते हुए कथाकार हृषीकेश सुलभ ने शब्द की सत्ता पर कई तरह के प्रश्न खड़े होने की बात की। इस सत्र का आधार वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए विनोद शाही ने शब्द की सत्ता पर उठ रहे सवालों को शाश्वत बताया। उनका मानना था कि रचनाकार शब्द सत्ता के माध्यम से मनुष्य को जड़ता से आजाद कराना चाहता है। रचनाकार भाषा के तयशुदा साँचों में सेंध लगाकर एक नई भाषा गढ़ना चाहता है क्योंकि मौजूदा साँचों पर दूसरी तरह की सत्ताओं का कब्जा हो चुका होता है और वे उससे आदमी को सम्मोहन में बाँध चुके होते है। युवा कथाकार विभास वर्मा का कहना था कि साहित्य को दूसरी सत्ताओं द्वारा दबाया जा रहा है तथा रचनात्मकता का हमारे जीवन में महत्व कम हो रहा है। उन्होंने ने कहा कि यह शब्द को बचाने का समय है न कि उसे सत्ता बनाने का। 
कथाकार तथा पाखी पत्रिका के सम्पादक प्रेम भारद्वाज की पीड़ा थी कि शब्द की सत्ता होनी चाहिए लेकिन है नहीं, जैसे जनता की सत्ता होनी चाहिए लेकिन है नहीं। उनका सवाल था कि यदि शब्द की अपनी सत्ता है तो वह दूसरी सत्ताओं की तरह दिखाई क्यों नहीं देती ? क्यों रचनाकार हाशिए पर पड़े रहे जाते हैं ? उनका मानना था कि हम जोखिम लेने से बच रहे हैं तथा बच-बचाकर चलने वाले ही मुख्य धारा में है ! 
बड़ोग के होटल पाइनवुड में आयोजित संगमन-18 का दूसरा सत्र 26 नवम्बर 12 को ‘मेरी प्रिय पुस्तक’ के बहाने शब्द सत्ता की सामर्थ्य की परख और पहचान पर केन्द्रित था। वन्दना राग द्वारा संचालित इस सत्र में नोबेल पुरस्कार विजेता जॉन स्टेन बैक के उपन्यास ‘दि ग्रेप्स आफ रॉथ’ (1939) की गहरी और भावप्रवण चर्चा की । 1930 की मन्दी के बाद अमरीका में कपास के किसानों की बदहाली पर केन्द्रित इस उपन्यास से अमरीका हिल गया था तथा तत्कालीन राष्ट्रपति रूजवेल्ट को श्रम कानूनों में तमाम सारे बदलाव करने के लिए बाध्य होना पड़ा था ! 
सत्र की दूसरी पुस्तक थी ग्रीक भाषा की निकोस काजान्सकीज़ की औपन्यासिक कृति ‘जोरवा दि ग्रीक’ जिसकी चर्चा जितेन्द्र भाटिया ने की। अपनी वार्ता के दौरान उन्होंने दो विदेशी लेखकों के उद्धरणों के आधार पर गहराई से शब्द सत्ता की चर्चा की। ‘बिना स्मृति के हम इन्सान कहलाने लायक भी नहीं रह जाते’ (मिलान कुन्देरा) तथा ’रचकर हम मृत्यु का प्रतिरोध करते हैं’ (इवान क्लीमा) का सन्दर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि रचनात्मकता का मूल स्रोत स्मृति संसार है। जब इस पर प्रहार होता है तो इससे बहुत बड़ा नुकसान होता है। 
अपनी प्रिय पुस्तक के रूप में खालिद हुसैनी के दो उपन्यासों ‘द काइट रनर’ तथा ’द थाउसेण्ड स्प्लेन्डिड सन्स’ की विस्तार से चर्चा की और कहा कि विरोध की मुद्रा में शब्द सबसे सशक्त होते हैं। हुसैनी ने अपने इन दोनों उपन्यासों के माध्यम से अफगानिस्तान की उन तमाम बेजुबान औरतों को ज़ुबान दी है जो बेज़ुबान होने के साथ-साथ बेचेहरा भी हैं। 
सत्र के अन्तिम रचनाकर के रूप में युवा कथाकार आशुतोष ने भवभूति के ’उत्तर रामचरितम’ नाटक की अत्यन्त भावप्रवण और गम्भीर विवेचना प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह नाटक राजस्व से रामत्व के हारते चले जाने की कथा है। 
इस सत्र के दौरान ही दुर्गा पब्लिक स्कूल सोलन के बच्चों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई तथा साहित्य को लेकर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान रचनाकारों के साथ संवाद करते हुए प्राप्त किया। 
आयोजन का अंतिम सत्र परिसंवाद के रूप में था, जिसमें बड़ी संख्या में साहित्यकारों ने प्रतिभाग करते हुए अपनी बातें रखीं। इस सत्र के संचालक देवेन्द्र ने कहा कि कोई सत्ता ऐसी नहीं होती है जो अपने को खतरे में डालकर शब्द की सत्ता स्वीकार करे। इस सत्र का आधार वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए भालचन्द्र जोशी ने कहा कि शब्द सत्ता और राज्य सत्ता के सम्बन्ध अत्यन्त संलिष्ट हो गए हैं। साहित्य का आदर नहीं है। जितेन्द्र भाटिया का निष्कर्ष था कि जो कुछ लिखा जा रहा है, उसमें बहुत सारा कूड़े जैसा है क्योंकि वह कोई रास्ता नहीं दिखाता। हिन्दी की 99 प्रतिशत समीक्षा स्वतःस्फूर्त न होकर किसी आग्रह या दबाव में लिखी जाती है। ऐसा लगता है कि छपे हुए शब्द का वजूद नहीं रह जाएगा। 
सत्र में भागीदारी करते हुए युवा कथाकार राम कुमार सिंह ने अपने चारों तरफ के माहौल से परेशान हो जाने की बात की तो तुलसी रमण ने टिप्पणी की कि यदि शब्द को सही जगह इस्तेमाल किया जाय तो वह आज भी असरकारी है, लेकिन उसका निरन्तर दुरुपयोग हो रहा है तथा ज्यादातर लेखक समय के बहाव में बह रहे हैं। दुर्गेश ने हिन्दी लेखकों में पारदिर्शता की कमी की बात की तो आत्मारामरंजन ने रचनाकारों की कथनी-करनी में फर्क होने तथा इस कारण अभिव्यक्ति की विश्वसनीयता पर संकट होने की बात स्वीकार की। इस कड़ी में ही रणीराम गढ़वाली ने आरोप लगाया कि पठनीयता का संकट हम लेखकों ने ही बढ़ा दिया है। बद्री सिंह भाटिया ने शब्दों के सही इस्तेमाल और रचनात्मकता को निरन्तर नवीन, विश्वसनीय और प्रभावी बनाने पर जोर दिया। 
संगमन-18 का समापन करते हुए वरिष्ठ कथाकार-उपन्यासकार गिरिराज किशोर ने जोर देकर कहा कि प्रेमचन्द की विरासत में जो लोग लिखने का दावा करते हैं, उन्होंने प्रेमचन्द की विरासत में कुछ नहीं लिखा है। यह दूसरी तरह का बाजारवाद है जो साहित्य में घुस आया है। उन्होंने कहा कि कविता के माध्यम से ‘ाब्द सत्ता को आसानी से समझा जा सकता है। इसके लिए बिहारी के प्रसिद्ध दोहे- 
‘नहिं पराग नहिं मधुर मधु नहिं विकास यहि काल !   
अली कली ही सों विंध्यो, आगे कौन हवाल !! 
का उद्धरण देते हुए कहा कि आज विकास की भयंकर स्थितियाँ हैं और यह दोहा आज के लिए भी सटीक बैठता है। 
आयोजन में हरिनारायण, केशव, गुरूमीत बेदी, अमरीक सिंह दीप, अरुण भारती की भी उल्लेखनीय उपस्थिति और सहभागिता रही। संगमन टीम की ओर से धन्यवाद ज्ञापन अमरीक सिंह दीप ने किया तथा स्थानीय संयोजक की हैसियत से एस०आर० हरनोट ने कृतज्ञता ज्ञापित की। 
इस अवसर पर पंकज दीक्षित व मुकेश बिजौले की कथा पोस्टर प्रदर्शनी विशेष आकर्षण का केन्द्र रही।
दिनांक 27.11.2012 को संगमन में बाहर से आये प्रतिभागियों ने 169 वर्ष पुरानी दगशाई जेल, म्यूजियम तथा पुरानी चर्च का भ्रमण किया। दगशाई जेल वर्तमान में पर्यटन स्थल के रूप में सुरक्षित रखी गयी है। महात्मा गाँधी ने भी इस जेल का दौरा किया था। ऐतिहासिक कामागाटामारू कांड के 4 आन्दोलनकारियों को यहाँ सजाएँ दी गयी थीं।  

प्रस्तुति-
कमलेश भट्ट कमल
-सी-631, गौड़ होम्स, गोविन्दपुरम,
गाजियाबाद-201013 (उ0प्र0)
मो0-9968296694






1 comment:

SHARDA KUMAR NEERA said...

सार्थक जीवन क्रम में नारी शक्ति का सम्मान करें
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पाशविकता के पाश में निरंकुश वीभत्स वासना!
बढा रही कारुण्य कथाओं की दुस्सह यातना!!

जीवन मूल्यों को बिखराकर
,तार तार इंसानियत
क्रूर हिसक अत्याचारों से ,
उन्मादित हैवानियत


स्त्री होना अभिशप्त बनाते कैसी है गंदी योजना!
बढा रही कारुण्य कथाओं की दुस्सह यातना!!

संबंधों के सूत्र तोडते,कामुक मन,
मिटा रहे औरत की पावन अस्मिता
दहेज शोषण से बढ़ाकर जलाती
स्त्रीत्व के अस्तित्व की चिता

नारी के पूजक भारत में, दुराचारो का नहीं थामना!
बढा रही कारुण्य कथाओं की दुस्सह यातना!!

:सुश्री शारदा कुमार नीरा