28 December 2006

टाँट्या भील : अद्भुत नाट्य प्रस्तुति


सिनेमा और दूरदर्शन ने नाटकों की मंचीय प्रस्तुति को बहुत नुकसान पहुँचाया है, ऐसा माना जाता है। परन्तु नाटक का मंचन यदि मँजे हुए कलाकारों के द्वारा हो और कुशल निर्देशक हो तो आज भी नाटकों का खोया हुआ स्वर्णिम काल फिर वापस आने में समय बहीं लगेगा। स्वतंत्रता संग्राम में टांट्या भील का बहुत बड़ा योगदान रहा है। टांट्या ने गरीब जनता के अधिकार की लड़ाई शुरू की। उसने अंग्रेजों के विरुद्ध आदिवासी जनता को एक मंच पर लाकर क्रांति का शंखनाद किया। वह भीलों तथा जनमानस में आज भी देवता की तरह पूजा जाता है। स्वराज संस्थान संचालनालय, संस्कृति विभाग भोपाल तथा जिला प्रशासन होशंगाबाद एवं वन्या प्रकाशन, भोपाल की ओर से स्थानीय एस० एन० जी० स्कूल के हाल में टांट्या भील पर जनयोद्धा शीर्षक से नाटक का दिनांक २८‍ १२ २००६ को सायं ७ बजे से मंचन किया गया। इस नाटक का निर्देशन श्री संजय मेहता द्वारा किया गाया। नाटक में जिन कलाकारों ने भाग लिया उन्हें देखकर तो ऐसा लग रहा था मानो टांट्या साक्षात अपने आदिवासी भीलों सहित आ गया हो। संवाद, अभिनय, प्रकाश व्यवस्था सब कुछ ऐसी कि जंगल का वास्तविक दृश्य ही लग रहा था।
जिन लोगों ने वर्षों से नाटक नहीं देखा था वे भी इस नाटक को देखकर यह कहते हुए पाये गए कि यदि ऐसे नाटक हर शहर में होने लगें तो लोग सिनेमा छोड़कर फिर नाटकों की ओर आयेंगे।
इसी शृंखला में २७ दिसंबर को श्री माधव बारीक द्वारा निर्देशित नाटक अवंतीबाई भी बहुत प्रशंसनीय रहा। २९ दिसंबर को सुश्री प्रीति त्रिपाठी द्वारा निर्देशित नाटक अज़ीजन का मंचन किया जाएगा।
टांट्या भील की प्रस्तुति देखकर दर्शक बहुत प्रभावित हुए।
इस अवसर पर श्री संतोष व्यास के संचालन में शहीद चन्द्रशेखर आजाद युवा मण्डल होशंगाबाद के प्रदेश अध्यक्ष श्री श्रीकृष्ण यादव द्वारा सभी कलाकारों का माल्यार्पण कर अभिनन्दन किया गया।

2 comments:

Dr.Bhawna said...

"टाँट्य भील" नाट्य प्रस्तुति के बारे में अच्छी जानकरी मिली। आपने सही कहा-
"नाटक का मंचन यदि मँजे हुए कलाकारों के द्वारा हो और कुशल निर्देशक हो तो आज भी नाटकों का खोया हुआ स्वर्णिम काल फिर वापस आने में समय नहीं लगेगा।"

मोहिन्दर कुमार said...

व्योम जी सबसे पहले मेरे ब्लोग पर आ कर टिप्पणी करने के लिये आपका बहुत बहुत धन्यवाद.
आप ने बिलकुल ठीक लिखा के कि आजकल सिनेमा और दूरदर्शन ने नाटक एव मंचन विधा को समाप्त सा कर दिया है. लोक कलाकार भुखमरी की कगार पर आ गये हैं. हर कला समय के साथ परवान चढती है औ एक उचाई के बाद उस को ढलान पर आना पडता है हो सकता है समय के साथ फिर से ये कला अपना स्थान पा ले, कौन कह सकता है